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वेटिंग

वेटिंग

कलाकार – नसीरुद्दीन शाह, कल्कि कोचीन, रजत कपूर, अर्जुन माथुर, सुहासिनी मणिरत्नम

निर्देशक – अनु मेनन

फिल्मकारों द्वारा फिल्मों के विषयों को लेकर जिस तरह के नए प्रयोग हो रहे हैं, उनमें ‘वेटिंग’ सुखद अनुभव है, जहां निर्देशक अनु मेनन ने अस्पताल जैसे दुख और अवसाद वाले माहौल को बैकड्रॉप बनाया, मगर नसीरुद्दीन शाह और कल्कि कोचलिन जैसे समर्थ ऐक्टर्स की सहज जुगलबंदी से फिल्म को उदास नहीं रहने दिया।

कहानी की शुरुआत होती है तारा (कल्कि कोचीन) से जो बदहवास कोच्चि के एक अस्पताल में प्रवेश करती है। वहां उसका पति रजत (अर्जुन माथुर ) गंभीर दुर्घटना के बाद कोमा जैसी स्थिति में दाखिल है। तारा और रजत की नई-नई शादी हुई है। अस्पताल में तारा की मुलाकात शिव (नसीरुद्दीन शाह) से होती है। शिव की पत्नी पिछले 6 महीनों से कोमा में है और डॉक्टर उसके ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके हैं, मगर शिव को पूरी आशा है कि उसकी पत्नी स्वस्थ हो जाएगी। यही वजह है कि वह लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने नहीं देता। रिटायर शिव की जिंदगी का केंद्र बिंदु उसकी पत्नी ही है, जबकि तारा भी बिलकुल अकेली है। उसके माता -पिता अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं और वह अपनी सास को इस दुर्घटना के बारे में नहीं बताना चाहती। उसे डर है की राहु-केतू में विश्वास करनेवाली उसकी अंधविश्वासी सास कहीं रजत की दुर्घटना के लिए उसे जिम्मेदार न मान ले। तारा को इस बात का दुख है कि फेसबुक और ट्विटर पर हजारों की तादाद में फॉलोवर्स होने के बावजूद इस जरूरत की घड़ी में वह अकेली है। उसकी सहेली इशिता उसे हिम्मत बंधाने आती है, मगर पारिवारिक मजबूरियों के कारण उसे भी लौटना पड़ता है। अब ये दो अजनबी मिलते हैं। दुख और परेशानी के इस माहौल में दोस्ती के रिश्ते में बांधकर जिंदगी से वो पल चुराते हैं, जो उन्हें डिप्रेशन से दूर ले जाता है। फिल्म के क्लाइमैक्स में आते-आते दोनों अपने साथियों की जिंदगी से जुड़े निर्णयों पर आकर रुक जाते हैं, मगर फिर वे जिंदगी को जीने का तरीका ढूंढ ही लेते हैं।

निर्देशक अनु मेनन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि कहानी डर, हताशा, बुरे की आकांक्षा में जीनेवाले दो ऐसे किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनके पार्टनर कोमा में हैं, इसके बावजूद उन्होंने फिल्म को कहीं भी भारी या मेलोड्रैमेटिक नहीं होने दिया। उन्होंने मौत जैसे विषय को बहुत ही लाइवली हैंडल किया है। निर्देशक ने रिश्तों का एक अलग संसार रचा है, जहां ये जिंदगी और मौत के बीच एक-दूसरे के लिए सपॉर्ट सिस्टम बनते हैं। निर्देशक अगर अस्पताल और घर के अलावा कोच्चि के आउटडोर लोकेशनों को भी परदे पर उकेरती तो फिल्म और ज्यादा दर्शनीय हो सकती थी।

एक लंबे अरसे बाद नसीरुद्दीन शाह को अपने पुराने रंग में रंगा देखकर अच्छा लगा। बीच में उन्होंने कुछ ऐसी निरर्थक भूमिकाएं भी की थी, जिन्हे देखकर उनके चाहनेवालों को निराशा हुई थी। उन्होंने अंदर से टूटे हुए मगर बाहरी तौर पर मजबूत शिव को अपनी अंडर करंट परफॉर्मेंस से एक नया आयाम दिया है। अभिनय के मामले में कल्कि ने उन्हें जबरदस्त टक्कर दी है। ऐक्शन-रिएक्शन के सिलसिले को वे बखूबी निभाती हैं। वे सही मायनों में अपने किरदार की परतों में समाई हुई नजर आती हैं। डॉक्टर की भूमिका में रजत कपूर ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्शाई है। राजीव रविंद्रनाथ, सुहासिनी मणिरत्नम, अर्जुन माथुर सहयोगी भूमिकाओं में अच्छे रहे हैं।

मिकी मैक्लिरी के संगीत में फिल्म के बैकग्राउंड में बजनेवाला गाना ‘तू है तो मैं हूं’ फिल्म के विषय के मुताबिक है।

लीक से हटकर बनी हुई फिल्मों के शौकीन तथा नसीर और कल्कि के फैन्स यह फिल्म देख सकते हैं।

रेखा खान
नवभारत टाइम्स

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