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वीरप्पन

वीरप्पन

कलाकार – संदीप भारद्वाज, सचिन जोशी, लीजा रे, उषा जाधव, जरीन खान

निर्देशक – राम गोपाल वर्मा

अगर आपको राम गोपाल वर्मा की बॉक्स ऑफिस पर पिछली सुपरहिट फिल्म का नाम बताने के लिए कहा जाए तो यकीनन आपको थोड़ा वक्त जरूर लगेगा, पिछले कुछ समय से रामू बॉलिवुड में अपनी फिल्मों से ज्यादा अलग-अलग सोशल नेटवर्किंग साइट्स अपने अजीबोगरीब ट्वीट्स को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। रामू की इस फिल्म की बात करें तो बेशक यह फिल्म बस ठीक-ठाक है। लोकेशन और लीड किरदार के सिलेक्शन में रामू ने बाजी मारी तो फिल्म के दूसरे अहम किरदार एसटीएफ ऑफिसर कानन के रोल में सचिन जोशी का सिलेक्शन यकीनन रामू की मजबूरी लगती है। दरअसल, सचिन की वाइफ रैना जोशी इस फिल्म की को-प्रड्यूसर हैं, ऐसे में सचिन को फिल्म में एक अहम किरदार देना कहीं न कहीं रामू की मजबूरी रही होगी। बेशक, रामू ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी धमाकेदार एंट्री के लिए उसी फिल्म को हिंदी में बनाने के लिए चुना, जिसने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया था, साउथ में रामू ने किलिंग वीरप्पन बनाई और फिल्म हिट रही। इस बार रामू ने इस फिल्म को हिंदी में बनाकर अपनी वापसी की।

कहानी : करीब तीस साल तक कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों में अपना राज स्थापित कर चुके चंदन तस्कर वीरप्पन (संदीप भारद्वाज) जंगल के एक-एक कोने को इस तरह से जानता है कि पुलिस कभी उसके पास तक भी नहीं आ पाती। अगर कभी पुलिस की कोई टुकड़ी वीरप्पन के पास पहुंचने में कामयाब हो भी जाती तो वीरप्पन ने पुलिस के जवानों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। बारह-चौदह साल की उम्र में वीरप्पन फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के सिपाहियों को चाय पिलाता है। इसी उम्र में वीप्पन ने पहली बार बंदूक भी फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के इन्हीं सिपाहियों से सीखी। जंगल में डयूटी करने वाले यही सिपाही वीरप्पन से हाथियों का शिकार करवाते। वीरप्प्न हाथियों को मारता है और पुलिस वाले हाथी दांत से होने वाली मोटी कमाई में से सौ-दो सौ रुपये उसे भी दे देते है। कुछ दिनों बाद जब पुलिस वाले वीरप्पन को ऐसा करने से रोकते हैं तो वह उन्हें ही मारकर जंगल में भाग जाता है। कुछ दिनों बाद उसके कुछ दोस्त भी उसके गिरोह में शामिल हो जाते हैं। शुरुआत में पुलिस वीरप्पन को हल्के में लेती है, लेकिन जब उसका आंतक बढ़ने लगता है तो उसे पकड़ने के लिए तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकारें स्पेशल टास्क का गठन करती है। टास्क फोर्स की टुकड़ी हर बार घने जंगलों में उसे पकड़ने निकलती है, लेकिन नाकाम होकर लौटती है। ऐसे में, टास्क फोर्स का अफसर कानन (सचिन जोशी) वीरप्पन को पकड़ने के लिए एक प्लान बनाता है। इस प्लान में कानन एसटीएफ के उस ऑफिसर की पत्नी को भी शामिल करता है, जिसे वीरप्पन ने बड़ी बेरहमी के साथ मार डाला था। कानन उसी ऑफिसर की पत्नी प्रिया (लीज़ा रे) को प्लान में शामिल करके वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी (उषा जाधव) तक पहुंचता है।

ऐक्टिंग : संदीप भारद्वाज ने वीरप्पन के किरदार को अपनी बेहतरीन ऐक्टिंग से पर्दे पर जीवंत कर दिखाया है। स्क्रीन पर संदीप को देखकर नब्बे के दशक का वीरप्पन दर्शकों के जेहन में घूमने लगता है। संदीप की डायलॉग डिलीवरी उसके हाव-भाव और बोलने का स्टाइल जानदार है। वहीं फिल्म में एसटीएफ ऑफिसर कानन के किरदार में सचिन जोशी की ऐक्टिंग को देखकर लगता है जैसे डायरेक्टर उनसे जबरन ऐक्टिंग करवा रहे हैं। लीज़ा रे कहीं प्रभावित नहीं कर पाती हैं। वहीं वीरप्पन की पत्नी के किरदार में उषा जाधव को बेशक रामू ने कम फुटेज दी, लेकिन इसके बावजूद उषा ने अपने किरदार को अपनी दमदार ऐक्टिंग से पावरफुल बना दिया।

निर्देशन : रामू की तारीफ करनी होगी कि वह वीरप्पन के खौफ को पर्दे पर उतारने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं। रामू ने नब्बे के दौर में मीडिया की सुर्खियों में छाए रहे वीरप्पन की चालाकियों और उसके काम करने के तरीके के साथ-साथ उसके शातिरपना अंदाज़ को पर्दे पर ईमानदारी के साथ उतारा। वहीं, वीरप्पन के साथ साथ फिल्म में सचिन जोशी यानी एसटीएफ ऑफिसर कानन को उनके कद से कहीं ज्यादा फुटेज देकर फिल्म की रफ्तार को कम कर दिया। इस बार रामू ने स्क्रिप्ट पर ध्यान दिया, लेकिन वीरप्पन के साथ जुड़े कुछ खास प्रसंगों को उन्होंने न जाने क्यों टच तक नहीं किया, यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है।

संगीत : आइटम सॉन्ग का फिल्मांकन अच्छा है, लेकिन फिल्म में ऐसा दूसरा कोई गाना नहीं जो हॉल से बाहर आकर आपको याद रह पाए।

क्यों देखें : अगर रामू के फैन हैं और एडल्ट तो इस फिल्म को देखा जा सकता है, वीरप्पन के किरदार में संदीप भारद्वाज इस फिल्म की यूएसपी है तो वहीं सचिन जोशी कमजोर कड़ी हैं।

चंद्रमोहन शर्मा
नवभारत टाइम्स

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