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फिल्म समीक्षा – उड़ता पंजाब

फिल्म समीक्षा – उड़ता पंजाब

तमाम विवादो के बाद रिलीज होने वाली ‘उड़ता पंजाब’ को सीधे सीधे ‘शंघाई’ और ‘ओह माय गॉड’ की श्रेणी मे रखा जा सकता है, ट्रीटमेंट की वजह से नहीं, विषय की तरफ अपनी अप्रोच की वजह से। ‘उड़ता पंजाब’ विशेष बन पड़ी है, कलाकारो के विशेष अभिनय से, कुछ बेहद विशेष संगीत से और कहीं कहीं अपनी असाधारण सिनेमेटोग्राफी से।

हालांकि सेंसर बोर्ड के साथ हुये सारे विवाद के चलते आम दर्शको का ध्यान उन चीजों की तरफ ज्यादा आकृष्ट हो गया, जो की वस्तुतः सिनेमा हाल मे एक सरप्राइज़ के तौर पर मिलनी थी, या जिन का उपयोग प्रमोशन के दौरान दर्शको के मन मे जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए किया जाना था। हालांकि न्यायालय ने अपना फैसला भी दे दिया और सब पक्षो ने उसे मान भी लिया। लेकिन फिर भी बड़ी आसानी से समझा जा सकता है की कुछ जगहो पर उपयोग की गयी अश्लील शब्दावलियों से सहज ही बचा जा सकता था।

किसी लंदन रिटर्न बिगड़ैल नशेड़ी पॉप स्टार का किरदार स्थापित करने के लिए अश्लील गालियां ही एक मात्र सहारा नहीं हो सकती। ‘रॉकस्टार’ में हम इससे मिलता जुलता किरदार देख चुके हैं। कोक-कॉक, कॉक-कोक जैसी कसरत भी गैर जरूरी ही थी। हालांकि, टोल नाके पर ड्यूटि करते पुलिस वालों के बीच होने वाली बातचीत मे ये ही गालियां घुली मिली प्रतीत होती हैं।

फिल्म के जो चार मुख्य पात्र हैं, वो ही फिल्म के चार मजबूत स्तम्भ हैं। शाहिद कपूर, ‘शानदार’ के हादसे के बाद जी तोड़ प्रयास करते दिखते हैं। काफी हद तक सफल भी होते हैं। मगर ये पात्र ही बेहद लाउड रचा गया है, और इसी कारण से कहीं कहीं सीमित भी हो गया है। हालांकि, आत्म साक्षात्कार का जो दृश्य है, वो बेहद लाउड होते हुये भी कहीं भी असंतुलित नहीं लगता। फिल्म के शुरुआत मे जो अतिरेक, हास्य पैदा करता है, मध्यांतर तक आते आते वही अतिरेक सहानुभूति पैदा करने लगता है। इस मायने मे ये पात्र विशेष बन पड़ा है।

आलिया भट्ट ने बिहारी मजदूर के पात्र मे जान डाल दी है। भाषाई पकड़ बहुत जगह ढीली होती दिखती है, लेकिन भंगिमा के स्तर पर उसने जो समर्पण प्रदर्शित किया है, उसके चलते भाषा की फिसलन पर अधिकतर दर्शको का ध्यान ही नहीं जाता। पहले कुछ मिनट तो एक आम दर्शक, आलिया को एक मजदूर के रूप मे स्वीकार ही नहीं कर पाते। मगर जैसे जैसे इस किरदार के मुंह से संवाद निकलने शुरू होते है, दर्शको का तारतम्य बैठता जाता है।

करीना कपूर अब एक निष्णात अभिनेत्री बन चुकी है। ‘तलाश’ और ‘हीरोइन’ मे हम देख चुके हैं। ‘उड़ता पंजाब’ मे भारी मेकअप से मुक्त करीना ‘युवा’ के एक लंबे अरसे बाद फिर से अपने सहज आकर्षक स्वरूप में मौजूद है। हालांकि करीना के पात्र का स्कूटर पर सब इंस्पेक्टर के पीछे जाने के दृश्य फिल्म मे ठूँसे हुये लगते हैं और कहानी का तारतम्य तोड़ते हैं। लेकिन बहुत से दर्शको को ये दृश्य भी पसंद आएंगे।

udta punjabदलजीत दोसांझ एक निर्मल हवा के झोंके की तरह अपनी उपस्थिती दर्ज करवाते हैं। बेहद साधा हुआ अभिनय करते हुये, बहुत ही आसानी से अपने किरदार का द्वंद सामने रख देते हैं। पगड़ीधारी सरदार होने के कारण हिन्दी सिनेमा मे उन्हे सीमित ही अवसर उपलब्ध होंगे, लेकिन उनमे संभावनाएं बहुत हैं।

इन सबके होते हुये, और तमाम विवादो को पीछे छोडते हुये फिल्म बहुत ही कामयाबी के साथ ड्रग्स के मुद्दे को बड़ी बेबाकी से उठाती है। नेताओ के आश्रय के बिना इतना बड़ा गैर कानूनी धंधा नहीं चल सकता, और फिल्म में इसे बहुत ही विश्वास के साथ कहा गया है।

चाहे डिस्क थ्रो चैम्पियन के हाथो ड्रग्स का पैकेट पाकिस्तान से हिन्दुस्तानी सीमा मे फेंकने का दृश्य हो, या इंस्पेक्टर के 16 वर्षीय भाई के पात्र का अपने पहले दृश्य मे ही बहुरंगी काँच के चश्मे के पीछे अपनी नशेड़ी आंखो को छुपाने का दृश्य हो, या आलिया के कमरे की खिड़की से दिखता हुआ होर्डिंग, सिनेमेटोग्राफी अपनी छाप छोडती है।

‘चिट्ठा वे’ और ‘इक कुड़ी’ गीत बहुत ही शानदार हैं। इस जोनर के श्रोताओं को ये लंबे समय तक पसंद आएंगे। अमित त्रिवेदी ने बहुत सजीव संगीत रचा है। पार्श्व संगीत कहानी के मिजाज के अनुसार ही रचा गया है और कहानी मे रचा बसा महसूस होता है।

फिल्म से अनुराग कश्यप का नाम जुड़ा है तो हत्याओ के दृश्य तो लाजिमी ही है। हालांकि एक से ज्यादा मौको पर होने वाली अचानक गोलीबारी या हत्याएँ दर्शको को हतप्रभ कर देती हैं। फिल्म का अंत तो हत्याओं की एक शृंखला के बाद ही होता है।

कुल मिला कर ‘उड़ता पंजाब’ एक शानदार फिल्म है। वास्तविक और प्रायोगिक सिनेमा के चाहने वालो के लिए ये फिल्म एक उम्दा अनुभव है।

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