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‘अमृता’ की याद के दो साल – सुदीप सोहनी

‘अमृता’ की याद के दो साल –  सुदीप सोहनी

अगस्त का महीना अमृता प्रीतम के जन्मदिन का महीना होता है। और इसी अगस्त महीने में आज ही के दिन हमने फैज़ाबाद से अपने नाटक ‘अमृता’ का सफ़र शुरू किया था। इन दो सालों में हमने फैज़ाबाद से लेकर नागपुर, जबलपुर, जयपुर, भोपाल, बीकानेर, अमृतसर, पटियाला, जालंधर, विदिशा कई शहरों में इसके मंचन किए। कोलकाता की बारी है अक्टूबर में। हर बार अमृता एक अलग तरह से हमसे मिलीं। आज मन भी भावुक है। सोचता हूँ कि क़िस्मत किस तरह से ज़िंदगी से मिलाती है। अमृता प्रीतम से क्या रिश्ता रहा होगा जो उनकी बदौलत खड़ा भी हो पाया! और उनके लिखे को कविता, गीत, संगीत, अभिनय, दृश्य आदि में हम सबने जीने का अनुभव पाया। कई बार लगता है जिन्होंने ये नाटक देखा है और जिनके दिल को छुआ है उसका ज़रिया हम भी बने। इसका मतलब एक शख़्स की वजह से कितने सारे लोग एक दूसरे से जुड़े। कला की दुनिया क़िस्सों से अलग दुनिया है ये हर बार लगा। क्या इसे केवल नाटक भर कह देने से यह बात ख़त्म हो जाएगी? पता नहीं…..हर बार करते हुए लगता है कि बस अब ये आख़री शो होगा। पर नहीं, जैसे ‘अमृता’ चलती जा रही है। आज जब दो बरस हुए हैं तो मन कहीं जाने नहीं दे रहा। ‘अमृता’ के आसपास ही जा रहा। क्या कहूँ?

श्वेता केतकरअगर बतौर निर्देशक सोचूँ तो लगता है कि मेरी क्या ही औकात जो अपनी तरफ़ से किसी का आभार भी जता सकूँ। यह सब तो ‘अमृता’ का ही है। हाँ, पर हर बार मुझे एक ज़िम्मेदारी ज़रूर महसूस हुई और ये भाव हमेशा रहा कि अमृता ने हमें चुना है उन्हें मंच पर कहने के लिए। इसलिए उस हलचल को बस सबके साथ साझा करना ही मेरा काम रहा। सबसे बड़ा हिस्सा तो श्वेता केतकर, हेमंत देवलेकर और अंकित पारोचे ने जिया। इन तीनों के बगैर मैं ‘अमृता’ की कल्पना नहीं कर सकता। मतलब हर बार मुझे लगा कि अमृता तो बस श्वेता ही, साहिर हेमंत भाई ही और इमरोज़ पारोचे ही। श्वेता के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं हैं। अमृता का सादापन श्वेता की अपनी ज़िंदगी का भी हिस्सा है और वह अपने सादेपन में ही विशिष्ट है। पर जब मंच पर होती है तो सचमुच दिव्य ही लगती है। नाटक खत्म होने के बाद श्वेता से मिलने की हिम्मत भी नहीं होती मेरी। हेमंत भाई के बारे में कुछ भी कहना संभव नहीं। उन्होंने कला में कई जीवन जिये हैं। और मुझे खुशी है कि उनकी इस कलायात्रा का मैं एक छोटा हिस्सा रहा हूँ। दादा से ‘अमृता’ पर बहुत बात हुई है और उन्होंने साहिर की छवि को हम तक पहुंचाया कि साहिर कैसे रहे होंगे। पारोचे एक छोटे बच्चे की तरह उंगली पकड़ते-पकड़ते कब बड़ा हो गया पता भी नहीं चला। कई लोग जब उसके किरदार और अभिनय पर रश्क करते हैं तो हम सबका सीना भी चौड़ा हो जाता है।

नितेश मंगरोले का संगीत ‘अमृता’ के शब्दों को और इमोशन्स को संवारता है। नितेश मुझे लाइव संगीत ही पसंद है और जब वो कविता आती है न ‘काया की हक़ीक़त से लेकर — काया की आबरू तक मैं थी, काया के हुस्न से लेकर — काया के इश्क़ तक तू था’ उसमें जो बांसुरी बजती है कविता के ख़त्म हो जाने पर वो हर बार पता नहीं कहाँ ले जाती है। कोशिश करना कि इस यात्रा के हर पन्ने पर तेरा साथ हो। इसी हेमंत देवलेकरसंगीत में हीरा धुर्वे, आशीष प्रसाद, अनिरुद्ध चौथमल, तेजस्विता अनंत, प्रशांत श्रीवास्तव जुडते हैं और तब संगीत का यह सुरीला सफ़र जाने कहाँ पहुंचा देता है। पूरे नाटक में पूरे ‘थाप’, ‘टंग-टुंग’, मेलडी, परकशन, गिटार, बांसुरी, ढोलक बजते रहते हैं। और ये लोग अपनी उम्रों में पता नहीं कितना लंबा सफ़र तय करते हैं। ‘विहान’ की इस यंग टीम पर बहुत नाज़ होता है और थोड़ी ईर्ष्या भी कि इनकी उम्र में मैं क्या कर रहा था, वो बता भी नहीं सकता! रवि अर्जुन को ‘चैत ने करवट ली’ गीत में हम सब बहुत याद करते हैं। एकता सोहनी, शिवानी सिंह, अम्बाली रॉयचौधरी, अनुराग तिवारी और बहुत से हमारे साथी इस संगीत के दल में अपनी सोहबत से इसे मधुर बनाते हैं।

निवेदिता सोनी ने ‘अमृता’ की पक्की सहेली का रोल निभाया है और पहले मंचन से लेकर अब तक श्वेता की तमाम मंच-परे की चिंताओं को अपने कंधों पर लिया है। बैक स्टेज की भागदौड़, अमृता-साहिर-इमरोज़ की यात्रा का सामान निवेदिता ने ही हमेशा तैयार किया। और किसी यात्रा के लिए घर से विदा करने वाली तैयारियों वाला हाथ जो यात्रा की सारी चिंताओं को मिटा देता है, बिलकुल वैसा ही।

जब ये सब तैयार हो जाते हैं तो एक व्यक्ति जो शुरू से आखिर तक जूझता रहता है वो है सौरभ अनंत। लाइट, सेट, प्रॉपर्टी और ओवर ऑल फील का क्या होगा वो सौरभ की आँखों में पहले से दर्ज रहता है। शायद हम सब नाटक जानते/समझते हैं पर उसे किया कैसे जाता है वो सौरभ ने सिखाया। इसलिए मैं अमृता, सौरभ को ही ‘डेडिकेट’ करता हूँ। यहाँ शुभम, आकाश इकहरे, हर्ष पाण्डेय मंच के इन ज़रूरी अनुशासनों में सौरभ का साथ देते हैं। और इस तरह हम अपने बाक़ी नाटकों की तरह ‘अमृता’ को भी कर पाने में कामयाब होते हैं। विहान ड्रामा वर्क्स की पूरी टीम इस मंचन को मुकम्मल करती है। और फिर बारी आती है डॉक्यूमेंटेशन की – विशाखा आशीष राठौर, ज्योति पटेल, कार्तिक नामदेव जैसे कई नाम हैं जिनके कारण फोटो और वीडियो में ‘अमृता’ के सारे अनुभव और यादें सुरक्षित हैं।

पर यह यात्रा पूनम चावला सूद और अशोक बिंदल जी के बगैर शुरू ही नहीं हो सकती थी। अगर फैज़ाबाद में पूनम जी और उनके साथी विशेष कार्यक्रम न कर रहे होते और बिंदल जी ने उन्हें मेरा नाम न सुझाया होता तो यहाँ पहुँचना संभव ही नहीं था। फिर दमानी जी, अरुण पाण्डेय जी, प्रीत पॉल हुंदल, टीम जयरंगम, दीपक गेरा जी, प्रीता माथुर जी, गुरविंदर भाई, इंदरजीत कौर गोल्डी जी, और वे तमाम लोग याद आते हैं जिनके कारण यह सफर अब ज़िंदगी बन गया है।

आप सभी को बहुत प्रेम, आभार है। हो सकता है कुछ ज़रूरी नाम छूट गए हों पर उन सब के प्रति आभार है।

और अंत में यह इमरोज़ साहब के प्रति भी नत होने का समय है। आखिर ‘अमृता’ तक ये बात तो आपने ही पहुंचाई है न !!

सुदीप सोहनी

सुदीप सोहनी भोपाल स्थित कला संस्थान ‘विहान ड्रामा वर्क्स’ के संस्थापकों में से हैं. सिनेमा और रंगमंच लेखन-निर्देशन में जुनून की हद तक सक्रिय। भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे के पूर्व छात्र।

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