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शिवमूर्ति: वंचितों की पीड़ा का किस्सागो

शिवमूर्ति: वंचितों की पीड़ा का किस्सागो

कथा साहित्य में एक आश्चर्य की तरह हैं शिवमूर्ति. आलोचक और संपादक लगभग आरोप की तरह कहते हैं कि इतना कम लिखकर इतनी अधिक ख्याति! पाठकों के बीच ऐसा अपनापा कितनों को हासिल होता है. और शिवमूर्ति से कभी किसी ने इस बाबत जानना चाहा तो उन्होंने जवाब दिया, “मुझे तो कभी-कभी लगता है कि मैं लेखक ही नहीं हूं. कभी लिख दिया तो लिख दिया. गाहे बगाहे का लेखन भी कोई लेखन है.” जीवन और साहित्य में यही सादगी और सहजता शिवमूर्ति की ताकत है.

11 मार्च, 1950 को सुलतानपुर (उत्तर प्रदेश) के कुरंग गांव में जन्मे शिवमूर्ति जन्मजात किस्सागो हैं. पहली कहानी 13 साल की उम्र में लिख डाली थी. गांव जवार के उनके बालसखा बताते हैं कि किसी घटना को शिवमूर्ति इस अंदाज में सुनाते थे कि सब कुछ जैसे सामने आ खड़ा हुआ हो. उनका शुरुआती जीवन बड़ा बीहड़ था. पिता बचपन में ही घर का भार इनके कंधों पर डाल संन्यासी की तरह स्वच्छंद हो गए थे. खेती, पढ़ाई, नाते-रिश्तेदारी, रुपयों का इंतजाम सब कुछ शिवमूर्ति के जिम्मे. मेला बाजार में मजमा लगाकर ताकत की गोलियां तक बेचीं. जीवन के संघर्ष ने उन्हें गढ़ा.

shivmurtiदलित, स्त्री और किसान चेतना के बेजोड़ रचनाकार हैं शिवमूर्ति. सवर्णवाद के शिकंजे में छटपटाते जनजीवन से उनका कदम-कदम पर साबका पड़ा था. जाति के आधार पर दुरियाये, लतियाये जाते लोगों की पीड़ा उन्होंने भोगी. शिवमूर्ति का दलित, स्त्री, कि सान विमर्श जीवन के अनन्य अनुभवों से आकार लेता है. इन्हीं अनुभवों से वे कथा रचनाएं निकलीं जिन्होंने अपनी स्थाई छाप छोड़ी. उनकी कहानियां हैं कसाईबाड़ा, अकालदंड, सिरी उपमा जोग, भरत नाट्यम, तिरिया चरित्तर, केशर कस्तूरी और ख्वाजा ओ मेरे पीर. और उपन्यास हैं त्रिशूल, तर्पण और आखिरी छलांग. शिवमूर्ति की रचनाएं चरित्र प्रधान हैं. यही कारण है कि उनके पात्र हमारी स्मृति में टिके रहते हैं.

तिरिया चरित्तर ने तो हिंदी संसार में भूचाल ला दिया था. विमली पर उसके ससुर की कुदृष्टि. दुराचार के बाद विमली पर ही दोषारोपण और पंचायत का फैसला कि टिकुली लगाने की जगह पर गरम कलछुल से दागा जाएगा. और फिर छन्न…कलछुल खाल से छूते ही पतोहूं का चीत्कार कलेजा फाड़ देता है.

उपन्यास रचना में भी शिवमूर्ति का हस्तक्षेप उल्लेखनीय है. सांप्रदायिकता को केंद्र में रखकर रचा गया त्रिशूल, बदलते दलित यथार्थ को व्याख्यायित करता तर्पण और आत्महत्या करते किसानों की सचाइयां बताता आखिरी छलांग. कहते हैं कि रचना में सब कुछ हो, मगर साहस न हो तो रचना निस्तेज हो जाती है. तर्पण का पियारे सवर्णों के साथ चल रहे झगड़े में जेल जाने से बच सकता है मगर वह अपने वकील को यह कहकर सन्नाटे में डाल देता है कि “मुझे जेल जाना है. जेल की रोटी खाकर प्रायश्चित करना है. इस पाप का प्रायश्चित कि कान पूंछ दबाकर इतने दिनों तक उन लोगों का जोर जुल्म सहता रह गया.”

शिवमूर्ति को व्यक्ति और लेखक बनाने में बहुत सारी स्त्रियों का हाथ है. इनमें भी बालसखा शिवकुमारी और जीवनसंगिनी सरिता का खास हाथ है. नाच-गाकर पेट पालतीं बेडिऩ जाति की शिवकुमारी ने संघर्षों में पिसते शिवमूर्ति को कदम-कदम पर मदद की. सरिता ने उन्हें पढ़ाई के प्रति सचेत बनाए रखा.

विधिवत शुरू हुए स्त्री विमर्श से बहुत पहले उनकी क हानियां हस्तक्षेप करती हैं. फैब्रिकेटेड दलित विमर्श से अलग तर्पण जैसी रचना किसी को भी विचारोत्तेजित कर देती है. सचाई यह है कि आम आदमी के सुख-दुख को “एक्टिविस्ट कथाकार्य की तरह समझने और पन्नों पर उतारने वाले शिवमूर्ति पर पाठकों का भरोसा ही उनकी उपलब्धि है.

  • सुशील सिद्धार्थ | सौजन्‍य: इंडिया टुडे

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