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नाटक : शकुन्तला की अंगूठी

नाटक : शकुन्तला की अंगूठी

भारत भवन में आयोजित राष्ट्रीय नाट्य समारोह की अन्तिम प्रस्तुति थी शकुन्तला की अंगूठी जिसे मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के कलाकारों ने वरिष्ठ रंगकर्मी और विद्यालय के प्राध्यापक आलोक चटर्जी के निर्देशन में मंचित किया। सुरेन्द्र वर्मा लिखित यह नाटक अव्यावसायिक रंगकर्मियों के एक समूह के पूर्वाभ्यास पर केन्द्रित है जो महाकवि कालिदास की रचना के मंचन की तैयारी कर रहा है।

नाटक की कथावस्तु में विषयानुकूल पूर्वाभ्यास करने वाले कलाकारों, मुख्य कलाकार जो कि प्रमुख रूप से नाटक का सूत्रधार भी है, दृश्यों की रचना और संवादों को याद करने, दोहराने और समय-समय पर किसी कलाकार के न आ पाने या उसके बाद में आने की जगह को भरने का काम कर रहे हैं। कुमार, कनक, चमन, निरंजन, छोटू, मजदूर, सुदर्शन, मैनेजर, मंदाकिनी, रेखा, कुमार की मकान मालकिन सेठानी, नायिका की माँ के चरित्र एक बहुत अनगढ़ तरीके से एक नाटक को पूर्णता तक पहुँचाने के बजाय नायिका के प्रति आसक्ति, स्मृतियों के दोहराव और भावनाओं के साथ बदलती संवेदनाओं के साथ व्यवहार में आते हैं।

नायक को फैलोशिप मिलने का पत्र आया है जिसे उसने बिना खोले जेब में रख लिया है, वह अपनी ही नायिका के प्रति भावुक हो गया है जो बाद में अपनी ही कुण्ठाओं और अनिर्णय की वजह से अपमान का शिकार होता है। नायक और उसका मित्र एक ही कम्पनी में काम करते हैं जहाँ का मैनेजर उनकी रचनात्मकता को दोयम मानते हुए उनको काम में उलझाये रखता है। इस तरह के दृश्य ऑफिस के बड़े बाबुओं की उस मानसिकता को भी उजागर करते हैं जो अपने आसपास किसी भी किस्म की रचनात्मकता के घोर विरोधी होते हैं, उसे हतोत्साहित करते हैं और पनपने नहीं देते।

शकुन्तला की अंगूठी नाटक को देश में अनेक प्रतिष्ठित रंगकर्मियों ने मंच पर प्रस्तुत किया है। यह नाटक किसी समय सुभाष उद्गाता के निर्देशन में लगभग पच्चीस साल पहले रंगमण्डल भारत भवन ने भी खेला है। योगवश रंगमण्डल के ही वरिष्ठ रंगकर्मी ने इसे मंचन के लिए अपने विद्यालय के कलाकारों के साथ करने का निर्णय लिया। आलोक गुणी कलाकार और निर्देशक हैं, वे दृश्य विन्यास और कलाकारों की मंच पर संवाद अदायगी, एक-दूसरे को प्रत्युत्पन्नमति के साथ अतिक्रमित करने की शैली को बखूबी संयोजित करते हैं।

कुछेक कलाकार हिन्दी के शब्द सही-सही नहीं पकड़ पाते, जैसे कमलिनी को कम लिनी बोलना, ऐसे ही एक शब्द और भी गलत उच्चारित होता है। मकान मालकिन देसी व्यक्तित्व के साथ प्रकट होती है लेकिन वह नुक्ते लगाकर संवाद बोलती है। पूर्वाभ्यास में यह आगे सुधार ही लिया जायेगा, उम्मीद है। नाटक में एक दृश्य बढ़िया बंधता है जो नायिका और उसकी माँ के साथ संवाद रटाने वाला है, वह दिलचस्प है, विशेषकर कलाकार शालिनी सिंह की प्रतिभा से। नाटक में अनुभवी रंगकर्मी अनूप जोशी बंटी की प्रकाश परिकल्पना थी। इसी प्रकार प्रत्यक्ष संगीत के लिए उमेश और वीनस तरकसवार की प्रशंसा की जानी होगी।

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