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जहाँ जलती चिताओं के बीच खेलते हैं बच्चे : राख से उड़ा पक्षी

जहाँ जलती चिताओं के बीच खेलते हैं बच्चे : राख से उड़ा पक्षी

श्मशान में मृत देह पहुंचती है, दाह संस्कार किया जाता है। दाह संस्कार तक श्मशान की खामोशी टूटती है फिर लोगों के जाते ही जलती चिताओं के बीच बचपन अंगड़ाई लेने लगता है। सामाजिक धारणाएं उनके जीवन में शून्य हैं। शवयात्रा देखकर उनके जहन में न तो शोक पैदा होता है और न ही दर्द।

जीवन की अंतिम नियति मृत्यु है। जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर वे मसान जोगी दाह संस्कार कराते हैं। लोगों के घरों का मातम इनके लिए खुशियाँ हैं। वो अंतिम संस्कार के दान और नवैद्य में अपनी खुशियाँ पाते हैं।

ये दृश्य था शहीद भवन, भोपाल में आयोजित विभा मिश्र स्मृति नाट्य समारोह में मंचित नाटक “राख से उड़ा पक्षी” का। डॉ. सतीश सालुंके द्वारा लिखित और सिद्धार्थ दाभाड़े द्वारा निर्देशित नाटक ने मौजूद लोगों को सोचने पर मज़बूर कर दिया कि कैसे समाज का एक तबका दयनीय जीवन जीने को विवश है। हम शायद जीवन के इस यथार्थ से अब तक अनजान थे।

निर्देशक ने एक-एक दृष्य को बेहद बारीकी और कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया। बच्चों ने जिस तरह से अभिनय किया उसकी केवल तारीफ़ करना पर्याप्त नहीं है। ये कलाकार जिस तरह से अपने चरित्र को निभाते हैं, रंग ना होने की स्थिति में दाह संस्कार के राख से होली खेलते हैं, सब कुछ मार्मिक कर देने वाला था।

प्रभावी संगीत, लाइट डिजाईन और सेट ने माहौल को जीवंत कर दिया।

नाटक – राख से उड़ा पक्षी
लेखन – डॉ. सतीश सालुंके
निर्देशन – सिद्धार्थ दाभाड़े
प्रस्तुति – त्रिकर्षि नाट्य संस्था
आयोजन – विभा मिश्र स्मृति नाट्य समारोह
शहीद भवन, भोपाल
15-सितंबर-16

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