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नाटक और रटना

नाटक और रटना

शिक्षा में अवधारणाओं को रट लेना एक अच्छी शैक्षिक प्रक्रिया नहीं मानी जाती है, लेकिन फिर भी यह प्रायः कहीं न कहीं  प्रतिष्ठित हो जाती है। यह शिक्षा में कितना जरुरी है या मज़बूरी है, इस मुद्दे पर बहस भी वर्तमान है। कमोबेश ऐसी ही स्थिति रंगमंच पर भी है। नाट्य मंडलियों में प्रायः दो-चार ऐसे अभिनेता होते हैं जो दूसरी या तीसरी रिहर्सल तक लाइनों को रट लेते हैं। यहाँ मैं इसके लिए संवाद शब्द जानबूझकर नहीं बोल रहा हूँ। शायद ही वे संवाद के वास्तविक अर्थ तक भूमिका को ले जा पाते हों। मैं हमेशा ही यह महसूस करता रहा हूँ कि आखिरी रिहर्सल तक मुकम्मल तरीके से याद नहीं कर पाया हूँ। लेकिन कभी असहायता की स्थिति में भी खुद को नहीं पाया है। चूँकि नाट्यकर्म की बुनावट में ही सहयोग व संभावनाओं का ऐसा अद्भुत ताना-बाना है, जो  आपको विश्वास के साथ पार ले जाता है।

अभी एक नाटक की रिहर्सल पर मेरे एक साथी अभिनेता एक अज़ीब मुश्किल से गुज़र रहा है। उसे पूरी तौर पर अपना रोल याद है। रिहर्सल के दौरान अक्सर वह कहता है, “क्या करूँ, मेरे संवादों में ‘अंदर’ के भाव बिलकुल निकल कर नहीं आ रहे है।” वह बिलकुल सच बोल रहा है। पूरी ईमानदारी के साथ वह इस सत्य को स्वीकार कर रहा है, जो एक अभिनेता का आवश्यक गुण है। लेकिन मेरे लिए चुनौती थी, यह पहचान करना कि उसकी मुश्किल की जड़ क्या है? यह बात गौर करने लायक थी कि रिहर्सल के शुरूआती दिनों में ही इस अभिनेता ने अपनी लाइनों को कंठस्थ कर लिया था।

शौकिया मंडलियों में इस तरह के अभिनेता अपनी तत्परता के कारण पसंद भी किये जाते हैं। किन्तु, यही तत्परता उनके सात्विक अभिनय में रूकावट बन जाती है।

प्रायः आलेख की पहली रीडिंग में ही अभिनय की यात्रा शुरू हो जाती है। यात्रा ही नहीं अच्छा खासा जीवंत नाटक हो जाता है। इस नाटक की रंगभूमि अभिनयशाला या रिहर्सल रूम नहीं होती, बल्कि वह अभिनेता के मानसपटल होती है। यह अभिनय लेखक के द्वारा खड़े किये गए चरित्रों व स्थितियों के रेखाचित्रों का होता है जिसमें अभिनेता की कल्पना के रंग उन्हें आकर देने लगते हैं। ये चरित्र अभिनेता के अवचेतन के तहखाने में जाते है, वहां अभिनेता के पूर्व अनुभव उनका मेकअप करके उन्हें शक्लें प्रदान करते हैं। वहीं स्टोर में रखी भावनाओं का एक झोंका इन चरित्रों में शक्ति फूंक कर जीवंत रूप में खेलने के लिए आँखों में तैरा देता है।

यह अभिनय पढ़ने के साथ-साथ मन में चल रहा होता है। इसमें विशेष बात यह है कि ये आकार जितनी स्पष्टता के साथ उभरते हैं, उतनी ही तेजी से मिट भी जाते हैं। किसी सपने सरीखे होते हैं ये आकार, सोते हुए एकदम रंगीन और आँख खुलते ही धूमिल! कुशल अभिनेता बस इतना करता है कि इन बुलबुलों के फूटने से पहले उन्हें सहेजना शुरू कर देता है। आगे का सारा काम इन्हीं आकारों के अनुसार अपने शरीर व सामग्रियों को ढालने का होता है।

जो अभिनेता प्रथम वाचन से आकारों पर गौर करने लगता है, उसके लिए आगे के वाचनों में आकार और साफ व स्पष्ट होने लगते हैं। और जिनका आग्रह शुरू से ही लाइनें याद करने पर रहता है उसके हाथ से वे जीवंत चित्र छूट जाते है। अगले ही वाचन में उसकी आँखों के सामने आते हैं  वर्ण, ध्वनियाँ, शब्द वाक्य…वाक्य…और वाक्य विन्यास तथा उनके साथ फंसी कुछ अस्पष्ट, धुली-पुंछी छवियाँ।

अभिनय में याद करना अपरिहार्य है लेकिन यह अगर उस मन के अभिनय को निरंतर शारीर में रूपांतरित करने के अभ्यासों के तहत हो तो बेहतर है। यदि यह याद करना सायास आग्रह के साथ होता है तो मंच पर आने के वक्त मन के आकारों की जगह सिर्फ टेक्स्ट ही आएगा। टेक्स्ट से काम चल सकता है लेकिन यह कसक बनी रहेगी, “क्या करूँ, मेरे अंदर के भाव नहीं नहीं निकल रहे?”

(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। )

दलीप वैरागी

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