Share This Post

नाटक बहुत कुछ सिखाते हैं..

नाटक बहुत कुछ सिखाते हैं..

कहा जाता है कि रंगमंच व अभिनय का कार्य करने तथा अपनी कहानी को दर्शकों तक एक दक्षता से पहुँचाने के लिए अपने अविश्वासों का पूरी इच्छाशक्ति के साथ त्याग सबसे पहली आवश्यकता है। सब जानते हैं कि यह कहानी वास्तविक नहीं है जिसका खुलासा सबकी आँखों के सामने हो रहा है तथा जिसे अब हरेक दर्शक देख रहा है। सभी दर्शक जानते हैं कि वे अब एक बड़े भवन में हैं जिसका मंच अभिनेताओं से भरा हुआ है, तब जैसे ही एक बार नाटक शुरू होता है सभी दर्शक भी अपने अविश्वासों को त्याग कर नाटक में तल्लीन हो जाते हैं। वे कहानी तथा उसकी परिस्थितियों के साथ धीरे-धीरे जुड़ने लगते हैं, यदि कहानी दक्षता के साथ विकसित की गई हो तो वे कहानी के साथ दूसरी दुनिया में पहुँच जाते हैं।

कहानी को प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने के लिए रंगमंच तथा नाटकों के निर्माण से सम्बन्धित सभी तत्वों जैसे कहानी की घटनाओं, अभिनय, रंगमंच का इस्तेमाल, सेटों, थूनियों, रोशनियों, परिधानों तथा संगीत आदि को समुचित ढंग से संयोजित किया जाना चाहिए। नाटक से जुड़े हरेक घटक या बिन्दु को सावधानी से सोचना तथा सुनियोजित करना चाहिए। पेशेवर नाटकों के निर्माण के समय आमतौर पर नाटकों के निर्देशक एक बड़े समूह या टीम के साथ नाटक के अभ्यास के प्रारम्भिक चरण से ही मिलकर काम करते हैं। ऐसे समूह में नाटक के प्रत्येक घटक के प्रभारी शामिल होते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि नाटक की शुरुआत से ही विभिन्न सृजनात्मक प्रयासों और विचारों को उचित समय व स्थान दिया जा सके।

मुझे कई पेशेवर नाटक समूहों के साथ बहुत ही नजदीक से कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैं कई ऐसे सफल निर्माणों का हिस्सा बन पाई हूँ जिनमें नाटकों की अन्तिम स्क्रिप्ट कई महिनों तक अनेक लोगों द्वारा की गई सामूहिक माथापच्ची का सफल परिणाम साबित हुई है तथा नाटकों की असली ताकत के रूप में उभरी। मैं जब भी महाविद्यालय तथा विद्यालय से जुड़ी अपनी रंगमंच सम्बन्धी यादों को पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे याद आता है कि कॉलेज में विचारों के आदान-प्रदान व सृजनात्मक प्रयासों से सामूहिक रूप से किसी नाट्य निर्माण के अवसर बहुत ही कम होते थे। विद्यालय में तो ऐसे अवसरों का पूरी तरह अभाव रहता था।

जब हम विद्यालय में बच्चों के रूप में नाटकों में भाग लेते थे तो हमें सिर्फ निदेर्शित ही किया जाता था कि हमें क्या करना, क्या पहनना और क्या कहना है। हमारे विचारों या सोच को विद्यालय के उन नाटकों में कोई स्थान नहीं दिया जाता था। किसी विचार या भाव पर खोजबीन करने की कोई संभावना नहीं होती थी। नाटक के सेट या पात्रों के पहनावे के विषय में हम अपना मत व्यक्त नहीं कर सकते थे। यहाँ तक कि हमें यह पूछने की आजादी भी नहीं होती थी कि हम नाटक किस विषय पर कर रहे हैं। फिर भी यह स्थिति कुछ हद तक समझी भी जा सकती है। क्योंकि नाटक की प्रभारी दो अध्यापिकाएँ होती थीं जिन्हें अपने निर्देशन में तीस से चालीस बच्चों को बहुत ही कम समय में बहुत अधिक काम करवाना होता था। विद्यालय शिक्षा में यदि रंगमंच तथा कला से जुडे़ कार्यों को नियमित रूप से पूरे वर्ष भर शामिल नहीं किया जाता तो यह स्थिति सुधर नहीं सकती, जो कि बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। रंगमंच एक विशेष कला है जो कि अभिनय कला के विभिन्न तत्वों पर आधारित है। जिनमें संगीत, नृत्य, अभिनय, शारीरिक भाव-भंगिमा तथा पृष्ठभूमि से जुड़े दृश्यों की अनेक गतिविधियाँ होती हैं और इनको सृजनात्मक ढंग से किया जा सकता है। इस वजह से बच्चों के साथ सामूहिक रूप से कार्य करने की बहुत-सी संभावनाओं व अवसरों को तलाश किया जा सकता है।

मेरा यह मानना है कोई व्यक्ति जन्म से कलाकार या विद्वान नहीं होता। यह हमें अलग-अलग कार्यों को करने के लिए मिलने वाले अवसर ही हैं जो हमारे अन्दर निहित रुचियों और कलाओं को असली आकार देने में सहायता करते हैं। वयस्क लोगों की अपेक्षा छोटे बच्चों के लिए यह बहुत आसान होता है कि वे यथार्थ की दुनिया को छोड़कर काल्पनिक संसार में खो जाएँ। बच्चे विलक्षण परिस्थितियों की कल्पना लगातार काफी समय तक कर सकते हैं तथा वे बहुत समय तक अपने आप को ऐसी परिस्थितियों में अनुभव करते हैं। वे अभिनय, कहानी कहने तथा अपने अविश्वासों को पूरी शक्ति के साथ त्यागने के सभी कार्यों को एक साथ करते हैं। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं तथा माध्यमिक विद्यालय में जाते हैं हमारे ऊपर अकादमिक विषयों की पढ़ाई का दबाव बढ़ने लगता है। लेकिन इस अवस्था में भी बच्चों में कल्पना तथा अभिनय करने की क्षमताएँ हमेशा मौजूद रहती हैं। बच्चों में बचपन से निहित कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता को सही ढंग से पेश किया जाए तो ये भी दूसरे मानसिक कौशलों की तरह स्थायी कौशलों के रूप में विकसित हो सकती हैं। ये बड़े होने पर हमारे पेशेवर जीवन में शक्तिशाली उपकरणों के रूप में हमेशा उपस्थित रह सकती हैं जो कि हमारे लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

मैं बच्चों के साथ काम करने की विशेषज्ञ नहीं हूँ। वास्तव में मेरी दक्षता डिजाईनिंग में है। लेकिन मैं यहाँ एक-दूसरे के सहयोग से सृजनात्मक कार्य करने की प्रक्रियाओं के विषय में अपने अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव पेश करूँगी। मेरे ये सुझाव विशेष रूप से सेट और थूनी (porp) वाले डिजाईन के क्षेत्र से सम्बन्धित हैं। इनका विद्यालयों में करवाए जाने वाले नाटकों में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

आइए, इन्हें आधारभूत ढंग से शुरू करते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँगी कि चलिए शून्य से शुरू करें। सबसे पहले आप अपने आपसे पूछें कि आपको जो अभिनय करना है उसके लिए औपचारिक रंगमंच बनाने की आवश्यकता होगी या यह अनौपचारिक वातावरण में खुले स्थानों पर भी आसानी से किया जा सकता है। अगला प्रश्न यह होगा कि क्या हमें रंगमंच को पूरी तरह भरने की आवश्यता होगी? इसका सबसे सामान्य हल यही ढूँढा जाता है कि पृष्ठभूमि में एक लम्बा कैनवास लगाया जाए जिसे समुचित ढंग से रंगा गया हो। कैनवास ऐसा हो जिससे दृश्य की स्थिरता का बोध हो सके। ऐसा करने से विषय के सन्दर्भ का उचित बोध होता है तथा पृष्ठभूमि के दृश्‍य भी सही ढंग से समझ में आते हैं। इस विषय में हमारे शिक्षकों को सबसे पहले बच्चों को सिर्फ मनोरंजन के लिए चित्रकारी करवाकर सहायता करनी होगी। लेकिन ऐसी पृष्ठभूमि कभी दुरूस्त दिखाई नहीं देती। इसके निचले भाग में कुछ दूसरी चीजें लगाकर सामने से अच्छी तरह ढका जा सकता है। इसके लिए कुछ आधारभूत ढाँचों और स्त्रोतों की आवश्यकता होती है। प्रारम्भ में यह प्रश्न भी पूछना अच्छा होगा कि क्या हमें वास्तव में पृष्ठभूमि की आवश्यकता है भी? पृष्ठभूमि के द्वारा आखिर आप दर्शकों को क्या दिखाना चाहते हैं? क्या इसे अभिनय या कुछ सांकेतिक भंगिमाओं और गतिशील रंगमंचीय सामग्रियों के द्वारा नहीं दिखाया जा सकता?

अगर आपके पास संसाधन पर्याप्त हों तो सामान्य रूप से इस्तेमाल किए जानेवाला दूसरी तरह का सेट, ‘बॉक्स सेट’ होता है। बॉक्‍स सेट में L या C आकार की पृष्ठभूमि होती है जिसमें आने-जाने के लिए विशेष प्रवेश और प्रस्थान द्वार होते हैं। अगर ‘बॉक्स सेट’ किसी इमारत में स्थित एक कमरे में हो तो उस स्थिति में आमतौर पर ‘बॉक्स सेट’ में एक दरवाजा और एक खिड़की होगी। संभवतया वहाँ कुछ तस्वीरें लटकाने वाले ढाँचे व इस तरह की अन्य चीजें भी होंगी। पृष्ठभूमि तथा बॉक्स सेट आमतौर पर वास्तविकता कि झलक दिखाने व ‘‘वास्तविकता’’ का दृश्य बोध करवाने की दृष्टि से इस्तेमाल किए जाते हैं। हालांकि हम जानते हैं कि दर्शक आमतौर पर मानसिक रूप से अपनी अविश्वसनियता को छोड़ने की तैयारी से ही आते हैं। बॉक्स सेट आपके रंगमंच के काफी बड़े हिस्से और गहराई को काट देता है। जिससे आपके अभिनय का क्षेत्र भी कुछ हद तक सीमित होता है।

किसी भी नाटक का प्रारम्भिक अभ्यास या रिहर्सल शुरू करते समय हम अपने समूह में सभी अभिनय करने वालों के साथ एक कार्यशाला करते हैं जिसमें स्थिर (freeze frames) नामक गतिविधि को सबसे पहले करवाया जाता है। इस विधि से हमें यह समझने का मौका मिलता है कि हम बिना किसी सेट का इस्तेमाल किए सिर्फ अभिनय करने वालों व उनके शरीरों को आधार बनाकर रंगमंच पर किस हद तक विषय के सन्दर्भ को स्थापित कर सकते हैं। यह गतिविधि बच्चों के साथ भी बेहद आसानी से की जा सकती है तथा यह उपयोगी होती है।

आपकी शुरुआत आपके सन्दर्भ के साथ होती है। मान लीजिए कि आप रेलगाड़ी के स्टेशन का दृश्य दिखाना चाहते हैं। आप दस लोगों का समूह लें और स्थिर ढाँचों वाला दृश्य उभारने को कहें। इस गतिविधि के तहत प्रथम व्यक्ति अभिनय करते हुए निर्धारित स्थान पर पहुँचकर दृश्य को दिखाने के लिए एक निश्चित भंगिमा बनाएगा। रेलवे स्टेशन का दृश्य दिखाने के लिए दूसरा व्यक्ति किसी भारी चीज को उठाकर चलने का अभिनय कर सकता है या प्लेटफार्म पर सोने या गाड़ी के पीछे भागने का। इस अभ्यास की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसके तहत अन्तहीन गतिविधियाँ की जा सकती हैं। इसलिए सबसे अच्छा तरीका यही होता है कि आप व्यक्ति (इस केस में बच्चा) को निर्णय लेने दें कि वह क्या करना चाहता है। ऐसी स्थिति में बच्चे अपने भीतर के विचारों और भावों को खुद ही पहचानते और व्यक्त करते हैं। अलग-अलग गतिविधियाँ उनको अपनी भूमिका को पहचानने व उसके विषय में सोचने, अपने आपको स्वाभाविक, सृजनात्मक बनाने तथा परिस्थिति के अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए प्रशिक्षित करती हैं। मेरा मानना है कि यह सभी कौशल सिर्फ रंगमंचीय नहीं बल्कि जीवन उपयोगी कुशलताएँ हैं।

एक बार पहले व्यक्ति ने अपनी निर्धारित भंगिमा बना ली है और वह वहाँ स्थिर हो गया तो दूसरा व्यक्ति चलता हुआ जाएगा और उसी दृश्य की दूसरी भंगिमा बनाएगा। यह स्थिति भी पहले व्यक्ति द्वारा लक्षित विषयवस्तु के समान ही होगी तथा उस स्थिति के सन्दर्भ से जुड़ी हुई होगी जो पहले व्यक्ति ने दर्शाई है। इस तरह आप आठ या दस लोगों के अभिनय से एक खास तरह के दृश्य की रचना करने में सफल हो सकते हैं। यदि आपके पास और व्यक्ति (या बच्चे) हैं, जो कि विद्यालय में अकसर होते हैं, तो इस बढ़ी हुई संख्या को अपने लाभ के लिए उपयोग कर सकते हैं। पहले दृश्य को स्थिर रहने दें। दूसरे समूह के लोगों को जो कि अब तक बाहर बैठे थे इस दृश्य की समालोचना करने को कहें। वे क्या देखते हैं? रेलगाड़ी कहाँ है, प्लेटफार्म कहाँ है, वहाँ क्या हो रहा है? क्या वह भीड़-भाड़ वाला दिखाई देता है, असंतुलित है, रोचक या उबाऊ है। इस अभ्यास या गतिविधि में समालोचनात्मक विश्लेषण एक महत्त्वपूर्ण औजार है।

हमारे बहुत सारे नाटक स्थिर ढाँचों की गतिविधियों में ही असफल होकर नाटकों की स्पर्धा से बाहर हो जाते हैं। इस अभ्यास को बार-बार करके आप अपने कलाकारों को यह अवसर देते हैं कि वे सीमित स्थान का उपयोग अधिक से अधिक किस तरह कर सकते हैं। किस तरह बिना जटिल सेटों की मदद के दृश्य परिवर्तित कर सकते हैं। लेकिन यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि केवल कलाकारों के शरीर के आधार पर हर तरह के दृश्य की रचना नहीं की जा सकती। कई बार सिर्फ एक थूनी ही दीर्घ अवधि के लिए उस तत्व को स्थापित करने में सहायक होती है जो आप कहना चाहते हैं। यदि हम स्थिर ढाँचों के अभ्यास को विस्तृत एवं बहुआयामी ढंग से इस्तेमाल करके देखते हैं तो हमारी अपेक्षाकृत बेहतर समझ बनती है कि हमें किस तरह की रंगमंचीय सामग्री की आवश्यकता है।

यह रंगमंचीय सामग्री असली वस्तुएँ भी हो सकती हैं। उदाहरण के लिए किसी नाटक में यदि आपको कुर्सी की आवश्यकता है तो आप वास्तविक कुर्सी का उपयोग कर सकते हैं, नहीं तो आप किसी घनाकार वस्तु का उपयोग भी कर सकते हैं। अर्थात् आप वास्तविक कुर्सी के स्थान पर किसी भी ऐसी चीज का इस्तेमाल कर सकते हैं जो बैठने के काम आ सके। दूसरे स्थिर ढाँचे में आप किसी ऐसी चीज का इस्तेमाल कर सकते हैं जिसके ऊपर खड़ा हुआ जा सकता हो। बहुउद्देषीय थूनी अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी होती हैं। उनका दक्षता से उपयोग करके दर्शकों को नाटकों में अधिक सम्मिलित किया जा सकता है तथा इनके उपयोग से नाटकों पर होने वाले खर्च को भी कम किया जा सकता है।

अपनी रंगमंचीय सामग्री का सबसे बेहतर उपयोग करने के लिए इन सामग्रियों का कार्यशाला में उपयोग करना जरूरी है अर्थात् रंगमंचीय सामग्रियों के साथ भी कार्यशाला की जानी चाहिए। हमें क्रियाओं या गतिविधियों की एक ऐसी शृंखला विकसित करनी चाहिए जिसमें सभी कलाकार एक-एक करके आएँ तथा थूनी का इस्तेमाल करते हुए परिस्थितियों की कल्पना करें। आप सिर्फ एक ही थूनी को कलाकारों द्वारा अलग-अलग ढंग से इस्तेमाल करने के लिए कह सकते हैं। थूनी का अलग-अलग ढंग से उपयोग उसी तरह किया जा सकता है जैसे मैंने कुर्सी का उदाहरण दिया है। मेरा आश्य पुनः यही है कि हरेक कलाकार को अपने विचार व्यक्त करने तथा अपने लिए खुद सोचने कि स्वाभाविक आदत डालना बहुत जरूरी है। इस तरह के अभ्यासों से इतने अद्भुत विचार आते हैं जो मुझे हैरान कर देते हैं। आमतौर हम सबसे पहले एक थूनी वाले अभ्यास से कार्य शुरू करते हैं तथा उसे धीरे-धीरे स्थिर ढाँचों वाले अभ्यासों तक ले जाते है जिसमें कई थूनियाँ संयुक्‍त रूप से इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें से हम सबसे अच्छे विचारों और योजनाओं को छाँटने कि कोशिश करते हैं जिन्हें नाटकों के अन्तिम प्रारूप में शामिल किया जाता है।

सृजनात्मकता को बढ़ाने के लिए आसपास उपलब्ध वस्तुओं को थूनी के रूप में उपयोग करना एक बहुत ही आसान परन्तु उपयोगी अभ्यास है। दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली ऐसी चीजों को इकट्ठा करें जो दिलचस्प आकारों में बनी हों। हर एक कलाकार को इस तरह की कम से कम एक वस्तु लाने को कहना चाहिए तथा निर्देशक को आपात भण्डार के रूप में कुछ अधिक वस्तुओं को इकट्ठा करके रखना चाहिए। इस क्रिया से आपके पास थूनियों का जो संग्रह होगा उसमें आपको विभिन्न प्रकार के आकार, वजन तथा बनावट वाली चीजें काफी संख्या में मिल जाती हैं। यदि कोई भी वस्तु मिलती है तो हम आसानी से पहचान सकते हैं कि अमुक वस्तु का अपने नाटक में क्या इस्तेमाल हो सकता है। कार्यशाला मे ऐसी वस्तुओं को इकट्ठा करके उनसे कई तरह की संभावनाएँ खोज सकते हैं। बहुत पहले किए नाटक में ग्रामोफोन के लिए खाना बनाने वाले बड़े-बड़े बर्तनों का उपयोग किया गया था। एलपी रिकार्ड को दिखाने के लिए खाने की साधारण प्लेटों के ढेर का इस्तेमाल किया था। बगीचे में कुआँ दिखाने के लिए ट्रक के तीन पहियों को एक के ऊपर एक जमाया था। इसी तरह गणेश मन्दिर को दिखाने के लिए कलाकारों द्वारा चन्द क्षणों में जल्दी-जल्दी दृश्य परिवर्तन करते हुए झाडुओं, टोकरियों, कपड़ों को इकट्ठा करके गणेश मन्दिर बना दिया गया था।

मैं जिस बिन्दु की तरफ आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहती हूँ वह यह है कि जितने अधिक से अधिक लोग सामूहिक रूप से नए विचार व योजनाएँ सोचने की कोशिश करेंगे उतनी अधिक नई योजनाएँ सामने आएँगी तथा उतना ही अधिक मजा आएगा। ऐसा करने के लिए हमें कलाकारों तथा कार्यशाला आयोजित करने वाले स्त्रोत व्यक्तियों को समुचित समय देना होगा। समय का यह निवेश भविष्य में बहुत अधिक लाभांश प्रदान करेगा।

कल्पना बालाजी एक वास्तुविद हैं। चेन्नई में रहती हैं और ‘पर्च’ नामक रंगमंच समूह से जुड़ी हुई हैं। ‘पर्च’ के गठन के समय से ही वे इसके नाटकों में डिजाइनिंग तथा विद्युत सजावट का कार्य कर रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में ‘पर्च’ ने भारत के अधिकांश इलाकों में अपने नाटकों का सफल प्रस्तुतिकरण किया है। ‘पर्च’ की प्रमुख नाट्य रचनाओं में ‘सांगथी अरिणहा हैव यू हर्ड’, ‘मून शाईन एन्ड स्काई टॉफी’, तथा ‘मिस मीना’ शामिल हैं। उनसे kalpana@diagrammar.in पर सम्पर्क किया जा सकता है।

यह Learning Curve XVIII Septembar, 2012 Special Issue on Arts in School Education में मूलत: अँग्रेजी में प्रकाशित लेख Child’s Play का अनुवाद है।

अनुवाद: निरूपा भटनागर

सम्‍पादन : राजेश उत्‍साही

Lost Password

Register