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स्मृतिशेषः पणिक्कर का जाना

स्मृतिशेषः पणिक्कर का जाना

जयदेव तनेजाः

हाल में मलयालम/ भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण शिखर-पुरुष कावलम नारायण पणिक्कर के निधन की सूचना तक देना हिंदी/ राष्ट्रीय मीडिया ने जरूरी नहीं समझा- यह देख कर दुख हुआ।

हाल में मलयालम/ भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण शिखर-पुरुष कावलम नारायण पणिक्कर के निधन की सूचना तक देना हिंदी/ राष्ट्रीय मीडिया ने जरूरी नहीं समझा- यह देख कर दुख हुआ। इन्होंने मलयालम के साथ-साथ संस्कृत और हिंदी में समान कुशलता और प्रवीणता और प्रभावशीलता के साथ अपने मौलिक और सार्थक रंग-प्रयोग किए। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी और पूरे परिवार ने निर्णय किया कि उनके अट्ठासी वर्षीय रंग-समृद्ध जीवन का उत्सव मनाया जाए- न कि मृत्यु का दुख। इसलिए जब तक शव को घर पर रखा गया और परिजन, प्रशंसक और परिचित-मित्र उनके अंतिम दर्शनों के लिए रहे, तब तक उस कक्ष के एक कोने में उनकी नाट्य-संस्था ‘सोपानम’ के सभी गायक कलाकार पणिक्कर रचित और संगीतबद्ध किए गीतों को लगातार गाते रहे।

उनके अंतिम संस्कार का वीडियो देखते हुए अचानक मुझे 6 फरवरी, 1980 की वह शाम याद आई, जब श्रीराम सेंटर द्वारा आयोजित चौथे राष्ट्रीय नाट्य-समारोह का उद्घाटन भास के संस्कृत नाटक ‘मध्यम व्यायोग’ के ऐसे सम्मोहक अभूतपूर्व प्रदर्शन से हुआ था कि वह पंद्रह-बीस मिनट का मूल आलेख मंच पर लगभग पौने दो घंटे तक खेला जाता रहा। और मंत्रमुग्ध से दर्शकों को तब होश आया, जब कर्टेन-कॉल हुआ और मंच पर उसके निर्देशक कावलम नारायण पणिक्कर को बुलाया गया।

उन्हें देखते ही खचाखच भरे प्रेक्षागृह के दर्शक तो जैसे पागल हो गए थे। वे खड़े होकर तब तक तालियां बजाते रहे, जब तक कि निर्देशक ने दो-तीन बार हाथ जोड़ कर दर्शकों से कुर्सियों पर पुन: बैठ जाने का आग्रह नहीं किया। कावलम नारायण पणिक्कर को 1978 में तब भी देखा था, जब वे दूसरे राष्ट्रीय नाट्य समारोह में कुमार वर्मा निर्देशित अपना लिखा मलयालम नाटक ‘देवत्तार’ लेकर आए थे। लेकिन ‘मध्यम व्यायोग’ के बाद तो लगा जैसे उन्हें पहली बार देख रहा हूं। लंबा कद, छरहरा बदन, चौड़ा माथा, मुस्कराता चेहरा, चश्मे के भीतर से झांकते प्रखर किंतु संवेदनशील आंखें, नीचे सफेद मुण्डू (धोती) और ऊपर कारा बार्डर वाली मेलमण्डी- एकदम गंभीर, सादा, सरल और शालीन व्यक्तित्व। यों तो ‘मध्यम व्यायोग’ की यह प्रस्तुति 1978 में तैयार की गई थी और इसके कई प्रदर्शन भी हो चुके थे। पर दिल्ली के श्रीराम सेंटर प्रेक्षागृह में हुए उस रात के प्रदर्शन ने कावलम नारायण पणिक्कर को राष्ट्रीय स्तर के श्रेष्ठ भारतीय नाट्य-निर्देशक के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था।

लेकिन मन में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा था कि संस्कृत के शास्त्रीय रंगमंच के पुनराविष्कार और उसे सर्वसाधारण के लिए लोकप्रिय बनाने का यह चमत्कार एक नाट्य प्रयोग से कैसे संभव हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने की प्रक्रिया में मैंने पाया कि सफलता के पीछे लगभग पच्चीस वर्षों की अनवरत साधना छिपी है।

शंभु मित्र, हबीब तनवीर, ब.व. कारंत और रतन थियाम जैसे आधुनिक भारतीय रंग-शैली की मौलिक तलाश में जुटे प्रतिबद्ध रंगकर्मियों के एक अन्य सहयात्री मलयालम के महत्त्वपूर्ण कवि, नाटककार, निर्देशक और शोधार्थी कावलम नारायण पणिक्कर का जन्म केरल के कुट्टनाड के एक सुंदर गांव कावलम में 20 अप्रैल, 1928 को हुआ था। बचपन से ही लोकगीत, संगीत और नाट्य में दिलचस्पी थी। बड़े होने पर रंगकर्म के क्षेत्र में कुछ नया और अर्थपूर्ण कर दिखाने की धुन में इन्होंने वकालत के अपने जमे-जमाए पेशे को छोड़ कर त्रिवेंद्रम में पहले ‘तिरुवरंग’ नामक नाट्य-संस्था की स्थापना की और 1960 के बाद ‘सोपानम’ की। 1961 से 1971 के बीच दस वर्षों तक केरल की ‘संगीत नाटक अकादमी’ के सचिव रहे। इसी दौरान, इन्होंने कूडियाट्टम, कलरी, मोहिनीअट्टम, कथकली, कक्कारिसी, तैय्यम, संस्कृत की शास्त्रीय नाट्य पंरपरा के साथ-साथ पश्चिमी नाटक और रंगमंच का गंभीर अध्ययन और अनुसंधान के साथ मौलिक रंग-प्रयोग भी किए।

आरंभ में इन्होंने स्वलिखित ‘साक्षी’, ‘देवयार’ जैसे मलियाली नाटकों को कुमार वर्मा से निर्देशित करवाया। 1974 में अपने नाटक ‘अवनमन कडंबा’ के निर्देशन के लिए चर्चित फिल्मकार जी. अरविंदन को आमंत्रित किया। यह प्रस्तुति समकालीन मलयालम रंगमंच के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुई। इसके बाद पणिक्कर और जी. अरविंदन की जोड़ी के रचनात्मक संयोग ने भारतीय रंगमंच को अनेक कीर्तिमान प्रस्तुतियों से समृद्ध किया। कम लोग जानते हैं कि पणिक्कर कवि, नाटककार, निर्देशक के अतिरिक्त फिल्मों से भी जुड़े थे और उन्होंने दो सौ से भी अधिक फिल्मी-गीत लिखे थे। इनकी रंग-शैली यद्यपि सादगी के कलात्मक सौंदर्यबोध से जुड़ी थी, पर अपनी प्रस्तुतियों को आकर्षक और लोकप्रिय बनाने के लिए इन्होंने फिल्मकार जी. अरविंदन के अलावा मलयालम सिनेमा के गोपी और मोहनलाल जैसे लोकप्रिय अभिनेताओं का सहयोग भी लिया था।

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भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण शिखर-पुरुष कावलम नारायण पणिक्कर

‘मध्यम व्यायोग’ के बाद 1983 में प्रस्तुत ‘करीम कुट्टी’ कावलम लिखित-निर्देशित पहला मलयाली नाटक था, जिस पर उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार मिला। एक दंतकथा पर आधारित यह नाटक एक ओझा द्वारा बंदी बनाई गई प्रेतात्माओं के नेता करीम कुट्टी के प्रति किए गए अन्याय के खिलाफ सभी बंदी प्रेतात्माओं के विद्रोह और अन्यायी स्वामी ओझा के त्रासद अंत की रोचक और सार्थक कहानी है। इसमें कावलम की नाट्य कला का उत्कृष्ट रूप देखने को मिलता है। इसके बाद कावलम की देश-विदेशव्यापी रंग-यात्रा आरंभ हुई, जिसमें उन्होंने विभिन्न संस्थानों और समारोहों में अपनी मलयालम, संस्कृत और हिंदी में तैयार की गई प्रस्तुतियों के विभिन्न नाट्य-प्रदर्शन किए। इनमें से कुछेक महत्त्वपूर्ण प्रस्तुतियों का उल्लेख मात्र ही यहां किया जा सकता है।

1981 में कालिदास अकादमी, उज्जैन में ‘विक्रमोर्वशीयम’ के चौथे अंक का संस्कृत में और ‘दूतवाक्यम’ का हिंदी में प्रदर्शन किया गया। 1982 में ‘उरुभंगम’ का संस्कृत में अमेरिका और हिंदी में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों के साथ, 1982 में ही ‘शाकुंतलम’ के संस्कृत प्रदर्शन को छठे राष्ट्रीय नाट्य समारोह, दिल्ली में प्रदर्शित किया गया। 1984 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों के साथ स्वरचित मलयालम नाटक के हिंदी अनुवाद ‘सूर्यस्थानम’ और रंग मंडल के साथ ‘मत्तविलास’ को हिंदी में अभिमंचित किया। 1984 में तैयार किए गए ‘कर्णभारम’ को 1999 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के भारत रंग महोत्सव में भी प्रस्तुत किया गया। 1987-88 में कावलम ने त्रिवेंद्रम में ‘भास नाट्योत्सव’ का आयोजन किया, जिसमें देश-विदेश के अनेक नाट्य-दलों ने भाग लिया। 1988 में ‘मत्तविलास’ के मलयालम अनुवाद को त्रिचूर के स्कूल आॅफ ड्रामा के लिए निर्देशित किया, तो 1989 में संगीत नाटक अकादेमी, दिल्ली द्वारा आयोजित ‘नेहरू शताब्दी नाट्य समारोह’ में भास के युद्ध-विरोधी संस्कृत नाटक ‘उरूभंगम’ का शानदार प्रदर्शन हुआ। 2009 में महिंद्रा नाट्य महोत्सव में कावलम ने ‘सोपानम’ के साथ संस्कृत में ‘कालीवेगम’ का प्रस्तुतीकरण किया।

कावलम नारायण पणिक्कर के रंग-अवदान पर मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग ने भारत भवन, भोपाल में 1992 में ‘रंग-सोपान’ और 2014 में ‘रंग-सोपान-2’ के अंतर्गत सात दिनों का अविस्मरणीय आयोजन किया। 2014 में दो मलयाली, दो संस्कृत और तीन नाटकों के हिंदी प्रदर्शन किए गए। ये सातों प्रदर्शन पणिक्कर द्वारा निर्देशित थे, पर सातवां प्रदर्शन ‘छाया शाकुंतलम’ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, रंग मंडल की प्रस्तुति थी, जिसे उन्होंने ‘भारत रंग महोत्सव’ दिल्ली की उद्घाटन नाट्य प्रस्तुति के रूप में तैयार करवाया था। 2014 में ही जयपुर के ‘रंगकुलम’ ने भी इनके सम्मान में एक सप्ताह का आयोजन किया था, जिसमें ‘थियेटर आॅफ रूट्स’ विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार भी आयोजित किया गया था।

जहां तक इनकी नवोन्मेषी, कल्पनाशील और ऊर्जस्वित नाट्य-कला का प्रश्न है, उनके समग्र रचना संसार का पुनरवलोकन करने पर हम कह सकते हैं कि मूलत: कवि होने के कारण इनके नाटकों का कथ्य, बिंब-विधान, प्रतीक और उनकी संरचना में भी काव्यत्व और लयात्मकता के तत्त्व प्रचुर मात्रा में दिखाई पड़ते हैं। कावलम के नाटकों की विषयवस्तु में पर्याप्त विविधता है, पुनर्जन्म और मानवेतर प्रकृति/ सृष्टि का अत्यंत नाटकीय इस्तेमाल देखने को मिलता है। प्रखर मुद्राएं, नाट्य-संगीत, तीव्र नृत्य गतियों, चित्रित अर्द्धपटियां, सुचिंतित प्रवेश-प्रस्थान, मुखौटे, कोरस और अनुष्ठानात्मक दृश्यात्मकता जैसी विशेषताएं इनके प्रस्तुतिकरणों को एक विशिष्ट सौंदर्य-बोध से मंडित करती हैं। परिधान-परिकल्पना, रूप-सज्जा और मंच-सामग्री में केरल में सर्वत्र सहज उपलब्ध रंगों, आकारों और वस्तुओं का अत्यंत रोचक उपयोग इन्होंने किया है। दृश्यांकन में कलात्मक सादगी और संगीत में मद्दलन, चैंड़ा, बांसुरी, नगाड़ा, मृदंग आदि पारंपरिक वाद्यों का सूझबूझपूर्ण प्रयोग इनके प्रदर्शनों को अलग पहचान देता है।

अपनी प्रस्तुतियों में कुडियाट्टम और कलरी जैसी परंपरागत लोक कलाओं के आधुनिक प्रयोग के संदर्भ में कावलम मानते हैं कि ‘परंपरागत कलाओं से प्रेरणा प्राप्त करना अतीत की ओर लौटना नहीं है। सच बात यह है कि हम परंपराओं की ओर नहीं जाते, बल्कि परंपराएं स्वयं हमारी ओर आती हैं। सच्ची परंपराएं परिवर्तनशील होती हैं, रूढ़िवादिता की पोषक नहीं।’ यथार्थवादी नाटकों की जकड़न को तोड़ कर अपनी लोक और पारंपरिक रंग पद्धतियों के सार्थक उपयोग से मलयालम में नई किस्म के कथ्य और शिल्प में पूर्णत: भारतीय नाटक लिखने और आधुनिक भारतीय रंग-शैली की मौलिक तलाश करने वाले रचनात्मक निर्देशक के रूप में कावलम नारायण पणिक्कर की चर्चा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की जाती रहेगी। इनका रंगकर्म प्रादेशिक होेने के साथ-साथ भारतीय भी था- इस सत्य को स्वीकार किए बिना हम कभी भी राष्ट्रीय रंगमंच की परिकल्पना नहीं कर सकते।

  • जयदेव तनेजाः

जनसत्ता से साभार

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