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एक थे परसाई

एक थे परसाई

उनसे यूँ तो ‘फेस टू फेस’ कभी मिलना नही हुआ। बस किताबों और अखबारों के मार्फ़त ही उनसे मुलाकात थी। उन्हें हाईस्कूल के दिनों में पहली बार पढ़ा तो लगा बायोलोजी की प्रयोगशाला में मेढक की जगह किसी ने समाज को रख दिया है। चीर फाड़ कर आँत-अंतडिया सब बाहर बिखेर दी और बता दिया कि ये है अंदर की सच्चाई। कोई अलीबाबा था जो कहता था खुल जा सिम सिम और छुपे खजानों के दानवी दरवाजे खुल जाते थे सो हम भी जिन्दगी के पेच फसने पर परसाई की तरफ देखते और पेच मानो उल्टा घूमना शुरू हो जाता।

हमारे घर, पड़ोस ,दुकान और दफ्तर सब की शक्ल यहाँ देखी पहचानी जा सकती थी। ‘वैष्णव की फिसलन’ वाला बनिया हमारे मोहल्ले का ही पंजवानी सेठ था। ‘तट की खोज’ वाली शीला बुआ में अपने मित्र की बड़ी बहन दिखती थी। ‘ दो नाक वाले लोग’ को पढ़ता तो अपने माँ पिता की याद आने लगती और ‘ठंडा शरीफ आदमी’ तो मानो मेरा अपना ही बयां था। छोटे छोटे वाक्य छोटे छोटे वाकये और तिलमिलाती छीटांकशी वाला परसाई का अंदाज़ सब मिलकर एक बड़ा प्रभाव पैदा करते। और सच ये है कि परसाई को लिखा ढूँढ ढूँढ कर पढ़ने की एक चरसी लत सी लग चुकी थी। लेकिन दूसरे नशे जहाँ हमें बेहोशी की और के जाते हैं, यह नशा नींद और बेहोशी का दुश्मन था। उन्हें पढ़ने के बाद एक बैचनी भीतर से जकड़ लेती, नींद सी उड़ जाती। उन्हें पढ़ने के बाद वैसा रह पाना मुश्किल था जो हम पढ़ने के पहले थे। उनकी भाषा ,उनका फार्म उनके विचारों का तीव्र संक्रमण करते थे। यदि पाठक में संवेदना की ज़रा भी सम्भावना शेष है तो उसकी ‘स्थित प्रज्ञता’ टूटनी तय है’।

परसाई ने मास्टरी से क्लर्की, क्लर्की से पत्रकारिता, पत्रकारिता से स्वतंत्र लेखन तक कई बार पेशा बदला किन्तु उनका अंदाज़ पहले वाला ही रहा यानी कि मास्टराना। छड़ी मार हिटलरी मास्टर नहीं बल्कि कलम से चीर फाड़ कर जगत जीवन के सत्य उद्घाटित करता मेढक फाडू मास्टर। कबीर जिसे लुकाठा कहते हैं वो परसाई के यहाँ कलम है। वो अपना अंदाज़े बयां भी कबीर की परम्परा से ग्रहण करते हैं। जो उन तक भारतेंदु, बालमुकुंद गुप्त, शिवपूजन सहाय, पाण्डेय बैचेन शर्मा उग्र और निराला से होते हुए पहुँची थी। कबीर की यह चेतना परसाई के लेखन में सहस्त्र मुख वाला विराट दर्शन देती है। किन्तु इस विराट पने के दवाब में वे दूसरे व्यंगकारों की तरह सिनिकल या दार्शनिक रूप से अस्थिर नहीं हो जाते। विचारों और सिद्धांतों की चूल से उनका लेखन कभी नहीं खिसकता। वे हर खतरे का डटकर मुकाबला करते है। कबीर की तरह कलम को लुकाठे की तरह इस्तेमाल करते हुए। “इंदिरा गांधी से एक भेंट” में वे स्वयम लिखते हैं “ मै वही कबीरदास हूँ लेकिन बीसवी सदी का।”

चेखव ने कहा था कि सुखी आदमी दुःख का साहित्य लिखता है और दुखी आदमी हास्य व्यंग्य लिखता है। परसाई ने व्यंग्य लिखा तो क्या वे दुखी आदमी थे? बेशक हाँ। किन्तु उनका दुःख चलताऊ दुःख नहीं था। वह उपरी कमाई के लिए विह्वल सरकारी बाबू या धनिये में लीद मिला रहे बनिए का दुःख भी नहीं था। वह माया से घबराये मोक्ष पिपासु भक्त का दुःख भी नहीं था। कबीर की तरह उनका दुःख भी पंचमकार में डूबे सुखिया संसार को नींद में गाफिल देखकर उपजा था। जिसके लिए अपने लेखन में वे जागते रहे और रोते रहे। उनका दुःख उन्हें निराशा,अवसाद, या आत्मघात की और नहीं ले जाता बल्कि उल्टे उत्कट जिजीविषा से भर देता है। दुःख ही उन्हें दुःख के कारणों की तह तक ले जाता है। और व्यंग्य की निगेटिव चेतना पाजिटिव बन जाती है। ज्ञानरंजन के साथ एक बातचीत में वे इसका खुलासा करते हुए कहते हैं कि वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि वह दुखी है कि इतना बुरा क्यों हुआ। वह एक बेहतर मनुष्य, एक बेहतर समाज व्यवस्था के प्रति आस्था रखता है इसलिए जो बुराई उसे दिखती है उसे इंगित करता है।

यही वो सूत्र है जो परसाई के व्यंग्य को एक प्रतिक्रिया मात्र होने से बचाता है। वह एक नुक्ताए नज़र के रूप में आता है। उसका ढांचा साहित्यक है किन्तु वह खड़ा जिस क्षेत्र में है वो समाजशास्त्रीय है। उनके औज़ार वैज्ञानिक भौतिकवादी हैं। साहित्य, समाजशास्त्र और वैज्ञानिक भौतिकवाद यही है वो थ्री इन वन फार्मूला जिसकी सहायता से अपना रचना संसार रचते हैं। यहाँ गलदश्रु भावुकता या हास्य विलगित फूहड़ता के लिए कोई जगह नहीं है। क्रोध, करुणा ,आंसू, हास्य सभी यहाँ उदात्त रूप में हैं। वे पराजित मनुष्य की बेबसी पर नहीं हसँते अपितु करुणा के साथ उसके पक्ष में खड़े दिखते हैं। हास्य उनका धेय्य भी नहीं था। शुरुआत में जब उनका परिचय ‘फनी राइटर’ के रूप में दिया गया तो उन्होंने उसका इतना तगड़ा प्रतिवाद करते हुए कहा कि यदि मेरे लेखन को पढकर हँसी आती है तो मेरे लिए शर्मनाक है। इस प्रतिक्रिया में जब उन्हें हास्य विरोधी घोषित किया गया तो ‘ वन मानुस नहीं हँसता’ जैसे लेख लिखकर उन्हें सफाई देनी पड़ी। जिसमे वे ‘जोनाथन स्विप्ट’ के इस फलसफे से सहमत नज़र आते हैं कि जितनी देर तक आदमी हँसता है उतनी देर तक उसके मन में मैल नहीं रहता, उसका कोई शत्रु नहीं होता। इस तरह हसँना मन की निर्मलता है। पर परसाई निर्मल हँसी से हटकर इर्ष्या और द्वेष की हँसी को भी लक्ष्य करते हैं। वे इसे लकडवग्घे की हँसी कहते हैं। और ऐसी हँसी को गोली मार देने का फरमान ही उनका लेखन है। उनका समूचा लेखन समाज के अतरे खोतरे में छुपे लकड वग्घे की शिनाख्त और उसे बेनकाब करने का उपक्रम है। परसाई ने अपने आप को डी क्लास किया और अपनी वर्ग चेतना को समाज के संघर्षों से जोड़कर धारदार बनाया। वे शहर के श्रमिक आंदोलन से जुड़े। मुक्तिबोध से जुड़कर मार्क्सवाद का पाठ पढ़ा और कलम को लड़ाई का हथियार बनाया अपने लिए नहीं उत्पीडत की और से लड़ने के लिए। परसाई ने कालजयी साहित्य लिखने के स्थान पर कालम ,स्तम्भ, पूछिये परसाई से, कबीरा खड़ा बाज़ार में लिखने की राह पकड़ी।

उनकी पक्षधरता घोषित है। वे ‘रामदास’ के साथ खड़े दिखते हैं तो इसलिए कि रामदास ने नाकामयाबी में भी सपने देखने नहीं छोड़े हैं। सपने हैं तो बदलाव की उम्मीद भी है। किन्तु ‘एक तृप्त आदमी की कहानी’ के मास्टर नंदलाल शर्मा के मध्यवर्गीय लिजलिजेपन के खिलाफ वे जलता लुकाठा लेकर पिल पड़ते हैं। वे निष्क्रिय ईमानदारों, ठंडे शरीफ आदमियों को न केवल चीन्ह लेते हैं उनकी नैतिकता, सिद्धांतवादिता, महानता की चादर को तार तार कर देते हैं। ऐसे दुचितेपन, अवसरवादिता, काइयापन के ऊपर उनका गुस्सा आसमानी कहर की तरह टूट पड़ता है।

स्कूल मास्टर नंदलाल शर्मा धार्मिक, नैतिक, आत्म संतोषी हैं। वे पूरे देवता हैं। राजनीति से विरक्त। हड़ताल में भाग नहीं लेते। मेहनत से पढाते हैं। कभी कोई शिकायत नहीं करते। उन्हें कोई जगत गति नहीं व्याप्ति। किन्तु देवता होकर भी क्या वे मनुष्य हैं? परसाई लिखते हैं “ एन. एल. मास्टर झरना है रेगिस्तान का। उसे देख लेने से ऐसा लगता है कि तीर्थ स्नान कर लिया हो। वह पूर्ण तृप्त आदमी है। उसे कोई भूख नहीं है।”

ऐसे पूर्ण तृप्त आदमी परसाई की नज़र में बीमार हैं। आवेशहीन, सम्वेदना से रहित, क्रिया प्रतिक्रिया से विमुख मात्र ‘बायोलोजिकल बीइंग’ परसाई की नज़र में एक रीढ़ विहीन केचुआ है, जो पांव के नीचे आ जाता है तो वे पूछते हैं ‘वो क्या था?’ छटपटाहट से मुक्त यथास्थ्तिवादी निष्क्रिय बुद्धिजीवी यही है।

दरअसल परसाई की वर्ग चेतना संपन्न दृष्टि ही उन्हें रोजमर्रा की मामूली बातों का बड़ा रचनाकार बनाती है। इसी के बूते वे प्रेमचन्द की परम्परा का बेटन लेकर आगे दौड़ जाते हैं। ‘महाजनी सभ्यता’ और ‘मंगलसूत्र’ से जकड़ा देहाती हिंदुस्तान परसाई तक आते आते आज़ाद तो होता है किन्तु आपातकालीन भी हो जाता है। मूल्यों की टकराहट में जहाँ नए मूल्यों का निर्माण होता है। संस्कारों , शास्त्रों और व्यवहार में गडबड झाला हो जाता है। राजनीति, धर्म, दर्शन, शिक्षा, कानून गोया जीवन के हर अनुशासन में टूट- फूट , बनाव- बिखराव दिखता है। इसी संधि पर खड़ा हिंदुस्तान परसाई की रचना भूमि है। वे सडांध मारती जगहों से नाक पर रुमाल रखकर गुजर जाने की जगह गंदगी को साफ़ करने में यकीन करते हैं। विद्रूपताओं पर प्रहार करते समय ज़ाहिर है उनका लहजा सख्त हो जाता है और सोंद्रयबोध भी ऐसा जो आभिजात्य को भदेस दिखाई दे। यद्यपि वो भदेस नहीं है किन्तु अंतिम छोर पर खड़े आदमी के वस्तुवादी नज़रिए से स्थितियों को देखने का सहज परिणाम है। यही कारण है कि पाखाने के मारे आदमी को सूर्य भी परमात्मा का लोटा नज़र आता है जिसे लेकर परमात्मा क्षितिज के नाले में उतर जाता है।

वस्तुत: सोंदर्य या शिल्प परसाई की चिंता के केन्द्र में नहीं है, अपितु सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन है। वे अमर होने के लिए नही लिखते, इसलिए लिखते हैं कि मरे हुए नहीं जीना चाहते। सट्टा फिगर लगाकर शाश्वत लिखने वालों के स्थान पर उन्होंने रोज मरने वाले रोजमर्रा के विषयों को चुना क्योंकि साहित्य उनके लिए सबके साथ मुक्ति का मध्यम है। उन्होंने लिखा “जो अपने युग के प्रति ईमानदार नहीं है, वह अनन्त कल के प्रति क्या ईमानदार होगा।”

सो वर्तमान को ठोकना बजाना ही परसाई के भविष्य गढ़ने का तरीका है। इस ठोकने बजाने में वे तटस्थ या निस्पृह भी नहीं रहते, ना ही अपने पाठक को रहने देते हैं। वे पत्रकार की तरह सच्चाई के संवाददाता ही नहीं बने रहते अपितु लुटे पिटे आदमी के पेरवीकर्ता भी बनते हैं। और ज़रुरी हो तो अपना फैसला भी सुना देते हैं। हम चाहें तो इसे लेखक का सर्वसत्तावाद कह सकते हैं किन्तु इसकी परवाह परसाई जैसों को नही होती। वे स्वयं को कहते थे कि लेखक छोटा हूँ पर संकट बड़ा हूँ। व्यवस्था के लिए ये बड़ा संकट उन्होंने लेखन में अपनी इसी भूमिका के चलते निर्मित किया था।

राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने एक लेख में परसाई की तुलना राजकुमारों को शिक्षा देने वाले “विष्णु शर्मा” से की है। राजकुमार “विष्णु शर्मा” की शिक्षा से राज-काज में कितने शिक्षित हुए इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता किन्तु यदि हम परसाई को पढ़ने के बाद हममें राजकाज और समाज को बदल देने की हूक नहीं उठती तो हमारे मनुष्य ना होने के लिए कोई प्रमाण आवश्यक नही है।

-हनुमंत शर्मा

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