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इतालवी नाटककार दारियो फो का जाना

dariofoदारियो फ़ो ने 13 अक्टूबर को 90 वर्ष की उम्र में हमें अलविदा कह दिया। एक नाटककार के साथ-साथ वे एक अभिनेता, गायक, लेखक, बुद्धिजीवी, राजनीतिक एक्टिविस्ट, फ़ासीवाद-विरोधी मुहिम के योद्धा, एक असफल वास्तुविद, निर्देशक, अभिकल्पक और चित्रकार भी थे। वे एक कृतज्ञ पति और जीवनसाथी भी थे, जिन्होंने अपनी सहधर्मिणी की भूमिका को स्वीकार करने में कभी कंजूसी नहीं की। उनकी पत्नी फ्रैंका रामे स्वयं एक नाटककार, अभिनेत्री और नारीवादी एक्टिविस्ट थीं। उन्होंने फ़ो का हमेशा साथ दिया। फ़ो एक अच्छे पिता भी थे। वे बड़ी साफ़गोई के साथ स्वीकार करते थे कि उनका जीवन असाधारण रूप से भाग्यशाली था। लेकिन उनके लिये वही संज्ञा सबसे सटीक लगती है, जिसका इस्तेमाल वे हमेशा अपनी शख़्सियत को ज़ाहिर करने के लिये किया करते थे- मसखरा और विदूषक।

फ़ो का सम्पूर्ण रचनालोक जीवन की विसंगतियों पर हंसने और उसकी भयावहता से एक हास्य के साथ मुठभेड़ करने पर केन्द्रित है। वे अच्छी तरह जान चुके थे कि परिहास कई बार अपमान से भी अधिक घाव करता है और हास्य से बढ़ कर कोई चीज़ नहीं जो जीवन को सम्पुष्ट कर सके। फ़ो एक विरल व्यक्तित्व थे। उस समाज में, जहां एक प्रतिभाशाली व्यक्ति को सनकी और संतप्त मानने का चलन है, फ़ो ने एक विचित्र, बल्कि कहना चाहिये कि ‘अतिविचित्र’ व्यक्ति होने का दुस्साहस किया।

दारियो फ़ो पूरी दुनिया के रंगकर्मियों के बीच अत्यधिक सम्मान प्राप्त कर सके। विभिन्न विधाओं में उनकी सैकड़ों कृतियां प्रकाशित हैं। उनके नाटकों की संख्या ही चालीस से ज़्यादा है। “ए मैडहाउस फॉर द सेन” उनका एक नाटक है, जिसमें उन्होंने कई सरकारी अधिकारियों को फ़ासीवाद के समर्थक के तौर पर चित्रित किया है। इसी प्रकार “मिस्तेरो बुफ़ो” भी उनका एक बहुविवादित नाटक है, जिसमें कामकाज़ी लोगों, राहगीरों, गवाहों और दर्शकों की नज़र से मसीह के चमत्कारों, कष्टों एवं यातनाओं को परखने की कोशिश की गयी है। “टू हेडेड एनोमली” (2003) इटली के तत्कालीन प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी पर सीधा कटाक्ष करने वाला एक नाटक है, जिसके प्रदर्शन के बाद बर्लुस्कोनी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए सभी प्रमुख टेलीविजन चैनलों में फ़ो के ख़िलाफ़ एक अघोषित प्रतिबंथ लगवा दिया था।

फ़ो का सबसे प्रसिद्ध नाटक “एन एक्सीडेन्टल डेथ ऑफ़ एन एनार्किस्ट” पूरी दुनिया में सैकड़ों भाषाओं में हज़ारों बार मंचित हुआ है और आज भी सत्ता के दुरुपयोग, यथास्थिति तथा राज्य के आतंक के ख़िलाफ़ प्रतिरोध में खड़े होने वाले रंगकर्मियों का वह पसंदीदा नाटक बना हुआ है। एक बातचीत में उन्होंने कहा है “मैंने अपने संपूर्ण जीवन में जो भी लिखा है, उसके मूल में केवल एक ही बात है- दुख। यह भूलना नहीं चाहिये कि मेरा नाटक “एन एक्सीडेन्टल डेथ…” एक ऐसे आदमी के बारे में है, जिसे खिड़की के रास्ते फेंक दिया गया था। इस नाटक को देखते हुए आसानी से समझा जा सकता है कि जिस समाज में पुलिस, न्यायपालिका और राजनीतिक संस्थाएं भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हों, उस समाज में आतंकवाद को पनपने से नहीं रोका जा सकता। आपको इस सच्चाई से कभी मुंह नहीं मोड़ना चाहिये। हास्य इन चुनौतियों का सामना करने के लिये लोगों को तैयार करता है।”

यह फ़ो के नाटकों की ताक़त थी कि इटली की पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ 45 से अधिक मामले दर्ज़ किये, उनकी पिटाई की और जेल में भी रखा। दारियो फ़ो जैसे विद्रोही व्यक्ति को नोबल पुरस्कार मिलना फ़ो के साथ-साथ उन तमाम लोगों के लिये भी अचम्भे की बात थी, जो फ़ो को जानते थे। विश्व सर्वहारा के इस महानतम नाटककार को सलाम।

— राजेश चन्द्र।

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