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सिनेमा : सत्तर का सिनेमा और गुलज़ार

सिनेमा : सत्तर का सिनेमा और गुलज़ार

हिंदी फिल्मों के लंबे इतिहास में सत्तर का दशक विविध धाराओं की महत्त्वपूर्ण फिल्मों के लिए जाना जाएगा। फिल्म इस उद्देश्य से भी बनाई जा सकती है कि व्यावसायिक लाभ प्राथमिक शर्त न हो।

सत्तर के दशक का हिंदी सिनेमा सोद्देश्य, स्वच्छ, कलात्मक मनोरंजन और गैरजिम्मेदार, मुनाफाखोर और निकृष्ट मनोरंजन के बीच संघर्ष की कहानी है। फिल्म को साहित्य, नाटक, संगीत, चित्रकला, फोटोग्राफी आदि अन्य कलाओं का एक बेहद असरदार, संश्लिष्ट माध्यम मानते हुए मुख्यधारा फिल्मों के सामांतर एक आंदोलन भारत के विभिन्न प्रदेशों में, बिना किसी गोलबंदी के विकसित हुआ था। समांतर फिल्मों के इन निर्देशक-निर्माताओं का मानना था कि बेहतर जनरुचि के विकास में फिल्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, साथ ही सामाजिक यथार्थ की असरदार प्रस्तुति से सिनेमा के जरिए जनता में जागृति लाना भी संभव है। इसके ठीक विपरीत मूलधारा की फिल्मों ने जनता को कपोल-कल्पित कथाओं पर आधारित फिल्मों के जरिए निम्नमान का मनोरंजन परोसते हुए जनता की रुचि को विकृत किया।

समांतर फिल्मों के आरंभिक दौर में सत्यजित राय, ऋत्विक घटक, बिमल राय, मृणाल सेन, तपन सिन्हा, ख्वाजा अहमद अब्बास, चेतन आनंद, गुरु दत्त, वी. शांताराम आदि फिल्म निर्देशक थे। इसे निस्संदेह भारतीय सिनेमा का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। इस दौर की फिल्मों ने प्राय: उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों को अपनी रचनाओं का आधार बनाया, जिसके चलते साहित्य की तरह फिल्मों ने भी समाज का यथार्थ पेश कर अपना राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व निभाया। हिंदी फिल्मों के लंबे इतिहास में सत्तर का दशक विविध धाराओं की महत्त्वपूर्ण फिल्मों के लिए जाना जाएगा। फिल्म इस उद्देश्य से भी बनाई जा सकती है कि व्यावसायिक लाभ प्राथमिक शर्त न हो। श्याम बेनेगल की फिल्मों ने पतनशील सामंती मूल्यों की निरंतरता को पेश करते हुए एक नए प्रतिबद्ध सिनेमा से हिंदी दर्शकों को परिचित कराया। अपनी फिल्मों के जरिए श्याम बेनेगल ने फिल्म को एक कारगर कला माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए मनोरंजन की एक अर्थपूर्ण परिभाषा तलाश की।

यह दशक हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित नई किस्म की सफल फिल्मों का समय भी रहा। फिल्म निर्माण के सभी पहलुओं जैसे निर्देशन, संपादन, संगीत, संवाद, पटकथा और अभिनय के उत्कर्ष के लिए उनकी फिल्मों ने अपनी पहचान बरकरार रखी। 1970 से 1980 का समय प्रमुख चार धाराओं की फिल्मों का दौर था। पहला- धार्मिक, चमत्कारिक और अलौकिक कथाओं पर आधारित फिल्मों का। दूसरा- मुख्यधारा सिनेमा का, जिसमें में ‘मनोरंजन’ के नाम पर नाच-गाना, मार-धाड़ को केंद्र में रख कर फिल्में बनीं, जहां गाहे-बगाहे अलौकिक, चमत्कारिक और दैवी घटनाओं को जोड़ कर जनता के मनोरंजन का एक अचूक फार्मूला ईजाद करने का प्रयास किया गया। तीसरी धारा उन सार्थक फिल्मों की थी, जहां कला की सार्थक उपयोगिता पर ध्यान केंद्रित कर एक के बाद एक नायाब फिल्में बनीं। इन फिल्मों में उन निर्देशकों के अपने कला माध्यम के साथ-साथ जनता के प्रति दायित्वबोध और कला की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए रचने का साहस देखा जा सकता है। हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार, बासु चटर्जी, बासु भट्टाचार्य सरीखे कई अन्य निर्देशकों नें हिंदी फिल्मों की धारा को एक नई दिशा दी।

गुलज़ार की आरंभिक दो फिल्मों में तत्कालीन समय की सच्चाई को बेहतर समझा जा सकता है। ‘मेरे अपने’ (1971) और ‘आंधी’ (1975) में गुलजार ने जहां सत्ता के हथकंडों और उसके द्वारा नई पीढ़ी के गलत इस्तेमाल को रेखांकित किया, वहीं इस व्यापक हिंसा और अपराधीकरण के पीछे राजनीति के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया है। ‘आंधी’ में आरती देवी की राजनीति की मुखालफत करते युवाओं का वर्ग-परिचय तो मिलता है, पर उनका व्यक्तिगत परिचय नहीं मिलता, क्योंकि फिल्म में वे केंद्र में नहीं हैं। आरती देवी और जेके के रिश्तों की कहानी फिल्म की मूल कथा है। इसके विपरीत ‘मेरे अपने’ में न सिर्फ इन युवकों का वर्ग-परिचय है, बल्कि हर युवक की अपनी-अपनी कहानियां भी हैं। इसमें गुलजार ने एक बड़े युवा वर्ग को नायक बनाया है। ‘दीवार’ (1975) और उसके बाद की फिल्मों में असंतोष की सामूहिक अभिव्यक्ति के स्थान पर एक व्यक्ति के असंतोष की लगभग हिंसात्मक और दुस्साहसिक अभिव्यक्ति है। हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार, बासु चटर्जी, बासु भट्टाचार्य और अन्य समानधर्मा निर्देशकों की ढेरों नायाब फिल्में इसी दशक में सामने आर्इं।

इस धारा के निर्देशकों की खासियत थी कि वे ‘समांतर’ सिनेमा के करीब थे, पर समांतर सिनेमा नहीं बना रहे थे, वे ‘मुख्यधारा’ फिल्मों के करीब थे, पर मुख्यधारा फिल्में नहीं बना रहे थे। हिंदी सिनेमा के इस दौर में गुलजार शायद सबसे भिन्न निर्देशक थे। खुद एक स्वतंत्र साहित्यकार होने के चलते वे कथा वाचन की बारीकियों को बखूबी जानते थे, कवि होने का लाभ उन्हें फिल्मों में एक सफल गीतकार बनने में मिला। बिमल राय के सहायक के रूप में उन्हें पटकथा और संवाद लेखन, फोटोग्राफी, संपादन आदि पक्षों को जानने का अवसर मिला। अंगरेजी, बांग्ला और उर्दू की कालजयी साहित्यिक कृतियों के साथ-साथ इन भाषाओं के समकालीन लेखन से भी परिचित थे। उनकी साहित्यिक अभिव्यक्ति की भाषा चूंकि उर्दू थी, उनकी फिल्मों पर इन दोनों का गहरा असर पड़ा। इन तमाम पक्षों ने मिल कर गुलजार की फिल्मों को एक खास पहचान दी।

गुलज़ार मानवीय रिश्तों के कथाकार हैं, पर स्त्री-पुरुष के प्रेम संबंधों की विविधता, जटिलता, माधुरी और तीव्रता को उन्होंने जिस खूबसूरती के साथ अपनी फिल्मों में बयान किया है वह हिंदी फिल्मों की एक बड़ी उपलब्धि है। उनकी फिल्मों में ऐसे प्रेम अपने लिए एक अलग स्वायत्त दुनिया बना लेते हैं, जहां अन्य पात्रों का अस्तित्व लगभग गैरजरूरी-सा लगता है। उनके यहां नायक-नायिका में कोई एक, कहानी के केंद्र में नहीं रहता, बल्कि ‘प्रेम’ एक केंद्रीय चरित्र के रूप में दर्शकों के सामने उपस्थित होता हैं। ‘आंधी’ में आरती देवी और जे.के. दोनों से अलग उन दोनों के बीच के रिश्ते फिल्म में अपनी खामोश उपस्थिति से दर्शकों को छू जाती है, जबकि यह संबंध न केवल पर्याप्त जटिल है, बल्कि व्यापक दर्शक वर्ग के लिए अपरिचित भी है। ऐसे ही एक विरल प्रेम को गुलजार ‘कोशिश’ में संजीव कुमार और जया भादुड़ी के जरिए पेश करते हैं। आरती (जया भादुड़ी) की मृत्यु के बाद भी हरि और आरती का प्रेम, न केवल फिल्म के केंद्र में बना रहता है, बल्कि उसकी दिशा भी निर्धारित करता है। इसी प्रकार ‘मौसम’ में डॉ. अमरनाथ (संजीव कुमार) और चंदा (शर्मिला टैगोर) के बीच प्रेम सम्बंधों की कहानी इस खूबी के साथ रची गई है, जिससे चंदा की मृत्यु के बाद भी अमरनाथ और चंदा का प्रेम फिल्म के केंद्र में बना रहता है। शरतचंद चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘पंडित मोशाय’ तत्कालीन बंगाली समाज की संकीर्णताओं और कुप्रथाओं को पेश अवश्य करता है, पर यह शुद्ध रूप से वृंदावन, कुसुम (हेमा मालिनी) और चरण (मास्टर राजू) के सघन आत्मीय रिश्तों की कहानी नहीं है। गुलजार इस उपन्यास की मूल कथा में रद्दोबदल कर इसे एक अभिनव प्रेम कथा में केंद्रित करते हैं।

गुलज़ार की सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचय हमें उनके साहित्य और फिल्मों में समान रूप से दिखता है। सत्तर के दशक में बनी गुलजार की फिल्मों में प्रेम के साथ-साथ इंसानी रिश्तों के नए और बेहतरीन चेहरों से दर्शक परिचित होते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सत्तर का दशक गुलजार के फिल्म जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण समय रहा। 1971 से 1999 तक गुलजार ने सत्रह फिल्में बनार्इं, जिनमें दस फिल्में 1970 से 1980 के बीच आर्इं। इन्होंने अन्य समानधर्मा फिल्म निर्देशकों द्वारा फिल्मों की धारा को एक मजबूत आधार देने का काम किया।

-अशोक भौमिक

जनसत्ता से साभार

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