विमर्श

नाटक बिदेसिया का एक किस्सा

1980 का दशक था। उस वक्त भिखारी ठाकुर लिखित और संजय उपाध्याय निर्देशित बिदेसिया नाटक तीन घंटे से ऊपर का हुआ करता था। 25 मिनट का तो पूर्व रंग हुआ करता था अर्थात् बिदेसी, बटोही, प्यारी सुंदरी और रखेलिन की कथा नाटक शुरू होने के 25 मिनट बाद ही शुरू हुआ करता था। अब तो पता नहीं कैसे यह भ्रम व्याप्त हो गया है कि डेढ़ घंटे से ज़्यादा का नाटक कोई देखना ही नहीं चाहता जबकि अभी भी कई शानदार नाटक ऐसे हैं जिनकी अवधि ढाई घंटे के आसपास है। अभी हाल ही में रानावि रंगमंडल ने दो मध्यांतर के साथ 6 घंटे का नाटक किया और लोगों ने भी छः घंटा देखा। अभी हाल ही में कई शानदार फिल्में आईं हैं जो तीन घंटे की हैं। आज भी गांव में लोग रात-रात भर नाटक (!) देखते हैं। तो शायद दोष लोगों यानी दर्शकों का नहीं है; शायद अब कलाकारों (लेखक, निर्देशक, परिकल्पक, अभिनेता आदि) में ही वह दम खम नहीं है कि वो डेढ़ घंटे से ज़्यादा वक्त तक लोगों ...Read More

मानवीय विष को निष्क्रिय करना ही कला का मकसद और साध्य है ! – मंजुल भारद्वाज

नाटक “अनहद नाद – Unheard Sounds of Universe” नाटक होते हुए भी “जीवन” है और जीवन में घटित “नाटक” को हर पल उखाड़ फैंकता है .. कलाकार की कला , कलात्मकता और कला सत्व है ..उनका सृजन नाद है .. व्यक्तिगत सृजन दायरे को तोड़कर उसे यूनिवर्सल , ब्रह्मांडीय सृजन से जोड़ता है और कलाकार को देश , काल ,भाषा , धर्म से उन्मुक्त कर एक सृजनकार , एक क्रिएटर के रूप में घडता है . “अनहद नाद – Unheard sounds of Universe”…  कलात्मक चिंतन है, जो कला और कलाकारों की कलात्मक आवश्यकताओं,कलात्मक मौलिक प्रक्रियाओं को समझने और खंगोलने की प्रक्रिया है। क्योंकि कला उत्पाद और कलाकार उत्पादक नहीं है और जीवन नफा और नुकसान की बैलेंस शीट नहीं है इसलिए यह नाटक कला और कलाकार को उत्पाद और उत्पादिकरण से उन्मुक्त करते हुए,उनकी सकारात्मक,सृजनात्मक और कलात्मक उर्जा से बेहतर और सुंदर विश्व बनाने के लिए प्रेरित और प्र...Read More

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” मानवता की कलात्मक हुंकार

नब्बे का दशक देश,दुनिया और मानवता के लिए आमूल बदलाव का दौर है। “औद्योगिक क्रांति” के पहिये पर सवार होकर मानवता ने सामन्तवाद की दासता से निकलने का ख्वाब देखा। पर नब्बे के दशक तक आते आते साम्यवाद के किले ढह गए और “औद्योगिक क्रांति” सर्वहारा की मुक्ति का मसीहा होने की बजाय पूंजीवाद का खतरनाक, घोर शोषणवादी और अमानवीय उपक्रम निकला जिसने सामन्ती सोच को ना केवल मजबूती दी अपितु विज्ञान के आविष्कार को तकनीक देकर भूमंडलीकरण के जरिये दुनिया को एक शोषित ‘गाँव’ में बदल दिया। ऐसे समय में भारत भी इन वैश्विक प्रक्रियाओं से अछुता नहीं था। एकध्रुवीय वैश्विक घटनाओं ने भारत की उत्पादक क्षमताओं को तहस नहस करना शुरू किया। अपने हकों की मांग करने वाले 66 हजार मिल मजदूरों को पूंजीवादी षड्यंत्र के तहत काम से निकाल दिया गया और मिलों पर ताला लग गया और मुंबई को सिंगापूर और शंघाई बनाने की साज़िश ...Read More

प्रेम कहानी एक कवयित्री और चित्रकार की

भारत की लोकप्रिय कवयित्रियों में से एक अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था – “मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वो सब देवताओं को जगाने की कोशिश थी, उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं।” अमृता और इमरोज़ का सिलसिला धीरे-धीरे ही शुरू हुआ था। अमृता ने एक चित्रकार सेठी से अपनी किताब ‘आख़िरी ख़त’ का कवर डिज़ाइन करने का अनुरोध किया था। सेठी ने कहा कि वो एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो ये काम उनसे बेहतर कर सकता है। सेठी के कहने पर अमृता ने इमरोज़ को अपने पास बुलाया। उस ज़माने में वो उर्दू पत्रिका शमा में काम किया करते थे। इमरोज़ ने उनके कहने पर इस किताब का डिज़ाइन तैयार किया। इमरोज़ याद करते हैं, ”उन्हें डिज़ाइन भी पसंद आ गया और आर्टिस्ट भी। उसके बाद मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हो गया। हम दोनों पास ही रहते थे। मैं साउथ पटेल नगर में और वो वेस्ट पटेल नगर म...Read More

एक थे परसाई

उनसे यूँ तो ‘फेस टू फेस’ कभी मिलना नही हुआ। बस किताबों और अखबारों के मार्फ़त ही उनसे मुलाकात थी। उन्हें हाईस्कूल के दिनों में पहली बार पढ़ा तो लगा बायोलोजी की प्रयोगशाला में मेढक की जगह किसी ने समाज को रख दिया है। चीर फाड़ कर आँत-अंतडिया सब बाहर बिखेर दी और बता दिया कि ये है अंदर की सच्चाई। कोई अलीबाबा था जो कहता था खुल जा सिम सिम और छुपे खजानों के दानवी दरवाजे खुल जाते थे सो हम भी जिन्दगी के पेच फसने पर परसाई की तरफ देखते और पेच मानो उल्टा घूमना शुरू हो जाता। हमारे घर, पड़ोस ,दुकान और दफ्तर सब की शक्ल यहाँ देखी पहचानी जा सकती थी। ‘वैष्णव की फिसलन’ वाला बनिया हमारे मोहल्ले का ही पंजवानी सेठ था। ‘तट की खोज’ वाली शीला बुआ में अपने मित्र की बड़ी बहन दिखती थी। ‘ दो नाक वाले लोग’ को पढ़ता तो अपने माँ पिता की याद आने लगती और ‘ठंडा शरीफ आदमी’ तो मानो मेरा अपना ही बयां था। छोटे छोटे वा...Read More

थिएटर ज़िंदगी के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना मॉर्निंग वॉक या वर्जिश

किशोर–किशोरियों के साथ अकसर जीवन कौशल के मुद्दों पर काम करने के मौके मिलते रहते हैं। उनके साथ जिन बुनियादी कौशलों पर काम किया जाता है उनमे से एक है – सम्प्रेषण का कौशल। ये ऐसा कौशल है जिसको साधने से इंसान के सब सामाजिक रिश्ते सध जाते हैं। पर ये कौशल आसानी से सधता नहीं है। प्रशिक्षणों में किशोरों के साथ इस कौशल पर काम करते तो हैं लेकिन दिल को संतुष्टि नहीं होती। कम्यूनिकेशन की जो गतिविधियां अकसर की जाती हैं, वे महज अटकलबाज़ी भर होती हैं जिनसे सामने वाले को थोड़ा चमत्कृत करके सम्प्रेषण के मुद्दे पर लाना और उसके महत्व को बताना भर होता है। बात कोई जमती नहीं। सब ऊपरी तौर से होता है, खोखला! कौशल पकड़ में नहीं आता। कौशल के स्तर पर वैक्यूम ही रह जाता है। इसमें सबसे हास्यास्पद स्थिति यह होती है कि यह वैक्यूम दोनों तरफ होता है, ट्रेनी में और ट्रेनर में भी। किशोर उम्र में हमारी परंपरा से ही रिश्तों म...Read More

नाटक और रटना

शिक्षा में अवधारणाओं को रट लेना एक अच्छी शैक्षिक प्रक्रिया नहीं मानी जाती है, लेकिन फिर भी यह प्रायः कहीं न कहीं  प्रतिष्ठित हो जाती है। यह शिक्षा में कितना जरुरी है या मज़बूरी है, इस मुद्दे पर बहस भी वर्तमान है। कमोबेश ऐसी ही स्थिति रंगमंच पर भी है। नाट्य मंडलियों में प्रायः दो-चार ऐसे अभिनेता होते हैं जो दूसरी या तीसरी रिहर्सल तक लाइनों को रट लेते हैं। यहाँ मैं इसके लिए संवाद शब्द जानबूझकर नहीं बोल रहा हूँ। शायद ही वे संवाद के वास्तविक अर्थ तक भूमिका को ले जा पाते हों। मैं हमेशा ही यह महसूस करता रहा हूँ कि आखिरी रिहर्सल तक मुकम्मल तरीके से याद नहीं कर पाया हूँ। लेकिन कभी असहायता की स्थिति में भी खुद को नहीं पाया है। चूँकि नाट्यकर्म की बुनावट में ही सहयोग व संभावनाओं का ऐसा अद्भुत ताना-बाना है, जो  आपको विश्वास के साथ पार ले जाता है। अभी एक नाटक की रिहर्सल पर मेरे एक साथी अभिनेता एक अज़ीब म...Read More

स्मृतिशेषः पणिक्कर का जाना

जयदेव तनेजाः हाल में मलयालम/ भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण शिखर-पुरुष कावलम नारायण पणिक्कर के निधन की सूचना तक देना हिंदी/ राष्ट्रीय मीडिया ने जरूरी नहीं समझा- यह देख कर दुख हुआ। हाल में मलयालम/ भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण शिखर-पुरुष कावलम नारायण पणिक्कर के निधन की सूचना तक देना हिंदी/ राष्ट्रीय मीडिया ने जरूरी नहीं समझा- यह देख कर दुख हुआ। इन्होंने मलयालम के साथ-साथ संस्कृत और हिंदी में समान कुशलता और प्रवीणता और प्रभावशीलता के साथ अपने मौलिक और सार्थक रंग-प्रयोग किए। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी और पूरे परिवार ने निर्णय किया कि उनके अट्ठासी वर्षीय रंग-समृद्ध जीवन का उत्सव मनाया जाए- न कि मृत्यु का दुख। इसलिए जब तक शव को घर पर रखा गया और परिजन, प्रशंसक और परिचित-मित्र उनके अंतिम दर्शनों के लिए रहे, तब तक उस कक्ष के एक कोने में उनकी नाट्य-संस्था ‘सोपानम’ के सभी गायक कलाकार पणिक्कर र...Read More

कविता भाषा में मनुष्य होने की तमीज है..!

जब हम साहित्य या साहित्य की किसी विधा की बात करते हैं, तो हमें उसके इतिहास के साथ साथ समग्रता में उसके विकास की बात भी करनी होगी। यहां जब हम उत्तर शती की हिंदी कविता पर बात करते हुए समाज और संवेदना के बरक्स कविता की क्या भूमिका रही और कविता पर क्या प्रभाव पड़े यह भी देखना पड़ेगा। किसी भी विषय पर बात करते समय हम यह तय भलें ही कर दें कि उत्तर शती पर बात करें, लेकिन हमें पीछे भी जाना होगा। देखना होगा कि आखिर यह यात्रा उत्तर शती तक किस तरह आई होगी। तभी हम मुकम्मल समझ विषय के बारे में बना पाएंगे। फिर यह भी है कि हमारा समाज, देश और यह विश्व भी तो उस साहित्य या कला के समानान्तर अपनी दूरी तय करते हैं और एक दूसरे पर प्रभाव भी डालते हैं। कविता की बात करें तो कविता अपने समय का सन्दर्भ होती है। हम उसमें वह समय देख सकते हैं जब उसकी रचना हुई। उस समय का समाज और उसके भीतर की हलचल सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, ...Read More

इप्टाः रंगमंच से ऐसे सड़क पर आया नाटक

गली के नुक्कड़ पर बैठे कुछ लोग. सुबह की चाय पर शुरू हो जाती है बहस कि अंग्रेज़ किस तरह की नीतियां अपना रहे हैं, क्या कांग्रेस उनका मुक़ाबला कर पाएगी, क्या हुकूमत किसानों को उनका हक़ देगी? बहस ज़ोर पकड़ती है और पुलिस के दो कारिंदे बीच बचाव करते हैं, धमकाते हैं, अंग्रेज़ सरकार की पैरवी करते हैं, शोरगुल बढ़ता जाता है. इतने में असल पुलिस आ जाती है, जो पहले रुआब जमा रहे थे भाग खड़े होते हैं. तो आसपास इकट्ठा हुई भीड़ को एहसास होता है कि अरे ये तो नाटक है. इस तरह शुरुआत हुई नुक्कड़ नाटक की. मुंबई इप्टा की शैली सैथ्यू बताती हैं कि ग़ुलाम भारत में नुक्कड़ नाटकों का मंचन इतना आसान नहीं होता था. कई बार अभिनेताओं को गिरफ़्तार कर लिया जाता था, भीड़ को तितर बितर करने के लिए लाठियां बरसाई जाती थीं. लेकिन इप्टा के सदस्य हर तरह की तैयारी से निकलते थे. उनका एक ही मक़सद होता- लोगों में अंग्रेज़ हुकूमत के ख़ि...Read More

हिंदी रंगमंच की चुनौतियां

हिंदी रंगमंच के समक्ष चुनौतियां वास्तव में जितनी दिखतीं हैं, उतनी हैं नहीं। उसे अपने ही पैरोकारों से खतरा है। हिंदी रंगमंच और रंगकर्म के समक्ष चुनौतियां बहुत हैं, जिनसे जूझना और निजात पाना आसान नहीं है। इनमें सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, कुलीनतावाद, उपभोक्तावाद और सबसे अधिक उभर कर आई कला बनाम व्यावसायिकता की चुनौतियां इन दिनों हिंदी रंगमंच को अधिक झेलनी पड़ रही हैं। इन चुनौतियों के पीछे जिन दृष्टियों का आधार है, वे इसे अपने स्तर पर निर्धारित करने लगी हैं। वही प्रस्तुतियां हों, जो विभाजनवादी दृष्टि को पुष्ट करें, उन्हीं प्रस्तुतियों को प्राथमिकता दी जाए जो एक क्षेत्र-विशेष की मानसिकता (यहां संकेत केंद्रीय कही जाने वाली धारा से है) को पुष्ट करें, उन्हीं मंचों को प्रतिष्ठा दी जाए, जिनमें कुलीनता और शास्त्रीयता को प्रमुखता मिले, वे नाटक ही मंचित हों, जो बाजारवादी मूल्यों को प्रसारित करते हों और उ...Read More

सिनेमा : सत्तर का सिनेमा और गुलज़ार

हिंदी फिल्मों के लंबे इतिहास में सत्तर का दशक विविध धाराओं की महत्त्वपूर्ण फिल्मों के लिए जाना जाएगा। फिल्म इस उद्देश्य से भी बनाई जा सकती है कि व्यावसायिक लाभ प्राथमिक शर्त न हो। सत्तर के दशक का हिंदी सिनेमा सोद्देश्य, स्वच्छ, कलात्मक मनोरंजन और गैरजिम्मेदार, मुनाफाखोर और निकृष्ट मनोरंजन के बीच संघर्ष की कहानी है। फिल्म को साहित्य, नाटक, संगीत, चित्रकला, फोटोग्राफी आदि अन्य कलाओं का एक बेहद असरदार, संश्लिष्ट माध्यम मानते हुए मुख्यधारा फिल्मों के सामांतर एक आंदोलन भारत के विभिन्न प्रदेशों में, बिना किसी गोलबंदी के विकसित हुआ था। समांतर फिल्मों के इन निर्देशक-निर्माताओं का मानना था कि बेहतर जनरुचि के विकास में फिल्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, साथ ही सामाजिक यथार्थ की असरदार प्रस्तुति से सिनेमा के जरिए जनता में जागृति लाना भी संभव है। इसके ठीक विपरीत मूलधारा की फिल्मों ने जनता को कपोल-कल्पित...Read More

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