नाटक समीक्षा

सच्चाई की बरबादी में भी उम्मीद की एक किरण दिखाता नाटक ‘नायक’

पंजाब के जालंधर शहर में कई तरंह के नाटक पेश किए जा चुके हैं लेकिन अनानेमस थीएटर का हमेशा यहीं मानना रहा है कि नाटकों को अलग-अलग ढंग से पेश किया जाए। इस बार भी इस टीम ने पंजाब के मशहूर लेखक गुरशरन सिंह के पंजाबी नाटक ‘नायक’ का सफल मंचन किया। यह नाटक समाज में भ्रिषट और सिफारशों पर चलने वाले कलयुग भरे जीवन की सच्चाई ब्यान करता है जिस की  कैद में हद से ज्यादा लोग आ चुके हैं और इसी कारण ईमानदार इंसान का कोई वजूद नज़र नहीं मिल रहा। नाटक की शुरूआत होती है एक कमरे से जहाँ एक 40-50 की उमर का शख्स अखबार पड़ रहा है तभी उसका बेटा कमरे में दाखिल होता है। वह बेटे को रोकता है और उस से कुछ वाद-विवाद करने के बाद पूछता है कि ज़िंदगी में उसने कुछ करना भी है या नहीं तो वह अपनी ज़ुबान से सच्चे शब्दों के ज़रीए यही कहता है कि वो तो कुछ करना चाहता है पर समाज ही उसे कुछ करने नहीं देता। पिता उसे बार-बार यही समझाता ...Read More

‘अमृता’ की याद के दो साल – सुदीप सोहनी

अगस्त का महीना अमृता प्रीतम के जन्मदिन का महीना होता है। और इसी अगस्त महीने में आज ही के दिन हमने फैज़ाबाद से अपने नाटक ‘अमृता’ का सफ़र शुरू किया था। इन दो सालों में हमने फैज़ाबाद से लेकर नागपुर, जबलपुर, जयपुर, भोपाल, बीकानेर, अमृतसर, पटियाला, जालंधर, विदिशा कई शहरों में इसके मंचन किए। कोलकाता की बारी है अक्टूबर में। हर बार अमृता एक अलग तरह से हमसे मिलीं। आज मन भी भावुक है। सोचता हूँ कि क़िस्मत किस तरह से ज़िंदगी से मिलाती है। अमृता प्रीतम से क्या रिश्ता रहा होगा जो उनकी बदौलत खड़ा भी हो पाया! और उनके लिखे को कविता, गीत, संगीत, अभिनय, दृश्य आदि में हम सबने जीने का अनुभव पाया। कई बार लगता है जिन्होंने ये नाटक देखा है और जिनके दिल को छुआ है उसका ज़रिया हम भी बने। इसका मतलब एक शख़्स की वजह से कितने सारे लोग एक दूसरे से जुड़े। कला की दुनिया क़िस्सों से अलग दुनिया है ये हर बार लगा। क्या इसे क...Read More

थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस का दिल्ली नाट्योत्सव – मंजुल भारद्वाज

थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस के दिल्ली नाट्योत्सव ने दर्शकों को झकझोरा और उसकी चेतना को नया सोच और नई दृष्टि दी। थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस नाट्य दर्शन के सृजन और प्रयोग के 25 वर्ष पूरे हुए। अपने सृजन के समय से ही देश और विदेश, जहां भी इस नाट्य दर्शन की प्रस्तुति हुई, न सिर्फ दर्शकों के बीच अपनी उपादेयता साबित की, बल्कि रंगकर्मियों के बीच भी अपनी विलक्षणता स्थापित की। इन वर्षों में इस नाट्य दर्शन ने न सिर्फ नाट्य कला की प्रासंगिकता को रंगकर्मी की तरह पुनः रेखांकित किया, बल्कि एक्टिविस्ट की तरह जनसरोकारों को भी बार बार संबोधित किया। दर्शकों को झकझोरा और उसकी चेतना को नया सोच और नई दृष्टि दी। इन 25 वर्षों में थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस के सृजनकार मंजुल भारद्वाज ने भारत से लेकर यूरोप तक में अपने नाट्य दर्शन के बिरवे बोये, जो अब वृक्ष बनने की प्रक्रिया में हैं। इन 25 वर्षो के सफ़र के माध्यम से मंजुल ने यह भी साबित किया कि ...Read More

संपूर्णता की तलाश में उलझी अधूरी दास्तान – आधे-अधूरे

नाटक – आधे-अधूरे लेखन – मोहन राकेश निर्देशन – साबिर खान रवींद्र मंच, जयपुर रवींद्रमंच पर ज्योति कला संस्थान की ओर से वरिष्ठ रंगकर्मी सुरेश सिंधु के संयोजन में आयोजित एस. वासुदेव सिंह स्मृति नाट्य समारोह के अंतिम दिन गुरुवार को मोहन राकेश की चर्चित नाट्य कृति ‘आधे-अधूरे’ का मंचन किया गया। सार्थक नाट्य संस्था के रंगकर्मियों की इस प्रस्तुति का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी साबिर खान ने किया। ‘आधे-अधूरे’ पिछले कुछ समय से जयपुर थिएटर में निरंतर खेला जा रहा है। इस नाटक में मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है जिसमें परिवार का मुखिया जो काम हाथ में लेता है वह असफल रहने पर घर में सारा दिन बेकार बैठकर कभी अखबार तो कभी आसपास मोहल्ले में घूमता रहता है। उसकी पत्नी परिवार का पेट पालने के लिए नौकरी करती है और सायं को जब घर वापस आती है तो घर में यहां वहां सामान बिखरा देखकर प...Read More

मुकाम पोस्ट डेरू जिला नागौर

जेकेके में खेला गया हिटलर की फंतासी पर आधारित नाटक ग्राम डेरू में हिटलर का प्लेन गिरने से उथल-पुथल मंच से जैसे ही पर्दा उठता है सबसे पहले दिखाई देता है दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह एडॉल्फ हिटलर का ऑफिस। हिटलर की कुर्सी खाली है, उसके पास खड़ा है हिटलर का सहायक गोबेल्स। तभी हिटलर का प्रवेश होता है। वो जर्मन भाषा में गोबेल्स को कुछ निर्देश देता है जिसका जवाब भी गोबेल्स जर्मन में ही देता है। तभी मंच पार्श्व से घोषणा होती है कि अब इस नाटक के सभी विदेशी पात्र हिंदी में ही बातचीत करेंगे। इसके साथ ही दोनों के बीच हिंदी में बातचीत शुरू होती है। इसमें हिटलर के बात करने का अंदाज निराला है। इसमें उसे एक कॉमेडियन में रूप में पेश किया गया जो कि उसकी सनकी फितरत का भी प्रतीक है। वो कभी अजीब सी हरकतें करने लग जाता है तो कभी अपने ऑफिस की टेबल पर खड़ा होकर बोलने लग जाता है। हिटलर की यही हरकतें लोगों को खूब हं...Read More

एमपीएसडी का शाहकार : ‘हितकारी लीला’

संजय उपाध्याय निर्देशित ‘आनंद रघुनंदन’ एक देखने लायक नाट्य प्रस्तुति है। सन 1830 में रीवा के राजा विश्वनाथ सिंह द्वारा ब्रजभाषा में लिखित इस नाटक को हिंदी का पहला नाटक भी माना जाता है। प्रस्तुति के लिए रीवा के ही रहने वाले नाटककार योगेश त्रिपाठी ने इसका अनुवाद और संपादन वहीं की बघेली भाषा में किया है। ‘आनंद रघुनंदन’ में रामकथा को पात्रों के नाम बदलकर कहा गया है। राम का नाम यहाँ हितकारी है, लक्ष्मण का डीलधराधर, सीता का महिजा, परशुराम का रेणुकेय, दशरथ का दिगजान, केकैयी का कश्मीरी, सूर्पनखा का दीर्घनखी और रावण का दिकसिर, आदि। तरह-तरह के रंग-बिरंगे दृश्यों और गीत-संगीत से भरपूर यह प्रस्तुति एक अनछुए लेकिन पारंपरिक आलेख का शानदार संयोजन है। इसमें इतने तरह की दृश्य योजनाएँ इस गति के साथ शामिल हैं कि व्यक्ति मंत्रमुग्ध बैठा देखता रहता है। धनुषभंजन के दृश्य में पात्रों का एक समूह बैठने के तरीके को...Read More

नाटक : शकुन्तला की अंगूठी

भारत भवन में आयोजित राष्ट्रीय नाट्य समारोह की अन्तिम प्रस्तुति थी शकुन्तला की अंगूठी जिसे मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के कलाकारों ने वरिष्ठ रंगकर्मी और विद्यालय के प्राध्यापक आलोक चटर्जी के निर्देशन में मंचित किया। सुरेन्द्र वर्मा लिखित यह नाटक अव्यावसायिक रंगकर्मियों के एक समूह के पूर्वाभ्यास पर केन्द्रित है जो महाकवि कालिदास की रचना के मंचन की तैयारी कर रहा है। नाटक की कथावस्तु में विषयानुकूल पूर्वाभ्यास करने वाले कलाकारों, मुख्य कलाकार जो कि प्रमुख रूप से नाटक का सूत्रधार भी है, दृश्यों की रचना और संवादों को याद करने, दोहराने और समय-समय पर किसी कलाकार के न आ पाने या उसके बाद में आने की जगह को भरने का काम कर रहे हैं। कुमार, कनक, चमन, निरंजन, छोटू, मजदूर, सुदर्शन, मैनेजर, मंदाकिनी, रेखा, कुमार की मकान मालकिन सेठानी, नायिका की माँ के चरित्र एक बहुत अनगढ़ तरीके से एक नाटक को पूर्णता तक पहुँचान...Read More

जहाँ जलती चिताओं के बीच खेलते हैं बच्चे : राख से उड़ा पक्षी

श्मशान में मृत देह पहुंचती है, दाह संस्कार किया जाता है। दाह संस्कार तक श्मशान की खामोशी टूटती है फिर लोगों के जाते ही जलती चिताओं के बीच बचपन अंगड़ाई लेने लगता है। सामाजिक धारणाएं उनके जीवन में शून्य हैं। शवयात्रा देखकर उनके जहन में न तो शोक पैदा होता है और न ही दर्द। जीवन की अंतिम नियति मृत्यु है। जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर वे मसान जोगी दाह संस्कार कराते हैं। लोगों के घरों का मातम इनके लिए खुशियाँ हैं। वो अंतिम संस्कार के दान और नवैद्य में अपनी खुशियाँ पाते हैं। ये दृश्य था शहीद भवन, भोपाल में आयोजित विभा मिश्र स्मृति नाट्य समारोह में मंचित नाटक “राख से उड़ा पक्षी” का। डॉ. सतीश सालुंके द्वारा लिखित और सिद्धार्थ दाभाड़े द्वारा निर्देशित नाटक ने मौजूद लोगों को सोचने पर मज़बूर कर दिया कि कैसे समाज का एक तबका दयनीय जीवन जीने को विवश है। हम शायद जीवन के इस यथार्थ से अब तक अनजान थे। निर...Read More

अदम्य साहस और त्याग की कहानी -दीपदान

नाटक ‘दीपदान’ चित्तौड़ की एक वीरांगना ‘पन्ना धाय’ के अदम्य साहस और त्याग की कहानी है। भारतीय इतिहास में पन्ना धाय का नाम मातृत्व, वात्सल्य, करुणा, साहस एवं बलिदान का शाश्वत प्रतीक है। मेवाड़ राजसिंहासन के उत्तराधिकारी कुँवर उदयसिंह को बनवीर से बचाने के लिए पन्ना धाय जो रास्ता निकालती है, वह अद्वितीय है। कुँवर उदय की रक्षा के लिए पन्ना अपने ही पुत्र को कुँवर के स्थान पर सुला देती है और कुँवर के खून का प्यासा बनबीर पन्ना के पुत्र चन्दन को कुँवर समझ कर उसकी हत्या कर देता है। पन्ना के इसी त्याग और साहस को नाटक “दीप दान” के जरिये मंचित किया गया भोपाल के शहीद भवन में। जिसका निर्देशन नीति श्रीवास्तव ने किया। नाटक में संगीत पुनीत वर्मा का था। ‘दीपदान’ डॉ.रामकुमार वर्मा’ द्वारा रचित एकांकी है। डॉ.रामकुमार वर्मा जिन्होंने नाट्य कला के विकास की संभ...Read More

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