रंगमंच

‘अमृता’ की याद के दो साल – सुदीप सोहनी

अगस्त का महीना अमृता प्रीतम के जन्मदिन का महीना होता है। और इसी अगस्त महीने में आज ही के दिन हमने फैज़ाबाद से अपने नाटक ‘अमृता’ का सफ़र शुरू किया था। इन दो सालों में हमने फैज़ाबाद से लेकर नागपुर, जबलपुर, जयपुर, भोपाल, बीकानेर, अमृतसर, पटियाला, जालंधर, विदिशा कई शहरों में इसके मंचन किए। कोलकाता की बारी है अक्टूबर में। हर बार अमृता एक अलग तरह से हमसे मिलीं। आज मन भी भावुक है। सोचता हूँ कि क़िस्मत किस तरह से ज़िंदगी से मिलाती है। अमृता प्रीतम से क्या रिश्ता रहा होगा जो उनकी बदौलत खड़ा भी हो पाया! और उनके लिखे को कविता, गीत, संगीत, अभिनय, दृश्य आदि में हम सबने जीने का अनुभव पाया। कई बार लगता है जिन्होंने ये नाटक देखा है और जिनके दिल को छुआ है उसका ज़रिया हम भी बने। इसका मतलब एक शख़्स की वजह से कितने सारे लोग एक दूसरे से जुड़े। कला की दुनिया क़िस्सों से अलग दुनिया है ये हर बार लगा। क्या इसे क...Read More

थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस का दिल्ली नाट्योत्सव – मंजुल भारद्वाज

थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस के दिल्ली नाट्योत्सव ने दर्शकों को झकझोरा और उसकी चेतना को नया सोच और नई दृष्टि दी। थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस नाट्य दर्शन के सृजन और प्रयोग के 25 वर्ष पूरे हुए। अपने सृजन के समय से ही देश और विदेश, जहां भी इस नाट्य दर्शन की प्रस्तुति हुई, न सिर्फ दर्शकों के बीच अपनी उपादेयता साबित की, बल्कि रंगकर्मियों के बीच भी अपनी विलक्षणता स्थापित की। इन वर्षों में इस नाट्य दर्शन ने न सिर्फ नाट्य कला की प्रासंगिकता को रंगकर्मी की तरह पुनः रेखांकित किया, बल्कि एक्टिविस्ट की तरह जनसरोकारों को भी बार बार संबोधित किया। दर्शकों को झकझोरा और उसकी चेतना को नया सोच और नई दृष्टि दी। इन 25 वर्षों में थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस के सृजनकार मंजुल भारद्वाज ने भारत से लेकर यूरोप तक में अपने नाट्य दर्शन के बिरवे बोये, जो अब वृक्ष बनने की प्रक्रिया में हैं। इन 25 वर्षो के सफ़र के माध्यम से मंजुल ने यह भी साबित किया कि ...Read More

इप्टा-अंक नाटय रंगोत्सव

इप्टा की इकाई इप्टा जयपुर की ओर से 8वां राष्ट्रीय इप्टा नाट्य रंगोत्सव 9 से 12 अगस्त रविन्द्र मंच सभागार में आयोजित किया जाएगा।  

नाटक बिदेसिया का एक किस्सा

1980 का दशक था। उस वक्त भिखारी ठाकुर लिखित और संजय उपाध्याय निर्देशित बिदेसिया नाटक तीन घंटे से ऊपर का हुआ करता था। 25 मिनट का तो पूर्व रंग हुआ करता था अर्थात् बिदेसी, बटोही, प्यारी सुंदरी और रखेलिन की कथा नाटक शुरू होने के 25 मिनट बाद ही शुरू हुआ करता था। अब तो पता नहीं कैसे यह भ्रम व्याप्त हो गया है कि डेढ़ घंटे से ज़्यादा का नाटक कोई देखना ही नहीं चाहता जबकि अभी भी कई शानदार नाटक ऐसे हैं जिनकी अवधि ढाई घंटे के आसपास है। अभी हाल ही में रानावि रंगमंडल ने दो मध्यांतर के साथ 6 घंटे का नाटक किया और लोगों ने भी छः घंटा देखा। अभी हाल ही में कई शानदार फिल्में आईं हैं जो तीन घंटे की हैं। आज भी गांव में लोग रात-रात भर नाटक (!) देखते हैं। तो शायद दोष लोगों यानी दर्शकों का नहीं है; शायद अब कलाकारों (लेखक, निर्देशक, परिकल्पक, अभिनेता आदि) में ही वह दम खम नहीं है कि वो डेढ़ घंटे से ज़्यादा वक्त तक लोगों ...Read More

संपूर्णता की तलाश में उलझी अधूरी दास्तान – आधे-अधूरे

नाटक – आधे-अधूरे लेखन – मोहन राकेश निर्देशन – साबिर खान रवींद्र मंच, जयपुर रवींद्रमंच पर ज्योति कला संस्थान की ओर से वरिष्ठ रंगकर्मी सुरेश सिंधु के संयोजन में आयोजित एस. वासुदेव सिंह स्मृति नाट्य समारोह के अंतिम दिन गुरुवार को मोहन राकेश की चर्चित नाट्य कृति ‘आधे-अधूरे’ का मंचन किया गया। सार्थक नाट्य संस्था के रंगकर्मियों की इस प्रस्तुति का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी साबिर खान ने किया। ‘आधे-अधूरे’ पिछले कुछ समय से जयपुर थिएटर में निरंतर खेला जा रहा है। इस नाटक में मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है जिसमें परिवार का मुखिया जो काम हाथ में लेता है वह असफल रहने पर घर में सारा दिन बेकार बैठकर कभी अखबार तो कभी आसपास मोहल्ले में घूमता रहता है। उसकी पत्नी परिवार का पेट पालने के लिए नौकरी करती है और सायं को जब घर वापस आती है तो घर में यहां वहां सामान बिखरा देखकर प...Read More

रंग कर्मियों के जत्थे उदास हैं

रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन के निधन के पश्चात उनके संबंध में विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन ने एक महत्वपूर्ण संस्मरण आलेख लिखा था। यह आलेख नागपुर से प्रकाशित लोकमत में 26 फरवरी 2012 को प्रकाशित हुआ था। – अंश पायन सिन्हा के फेसबुक टाइमलाइन  से… रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन ने चार दशकों तक निरंतर रंगकर्म करते हुए अनेक बेजोड़ नाटकों की प्रस्तुतियाँ देश भर में की हैं। उन्हें संगीत नाटक अकादमी का सर्वोच्च सम्मान भी मिला जो इसी वर्ष मार्च में दिल्ली में दिया जाना था, पर मृत्यु ने इसे संभव नहीं होने दिया। इसी 12 फरवरी को मात्र 64 वर्ष की उम्र में, भोपाल में उनका निधन हुआ। देश और मध्यप्रदेश में इस निधन से रंग कर्मियों को गहरा आघात लगा है। उनके अपने रंग-मंडल के अनगिनत सदस्य और पूरा वक्ती कार्यकर्त्ता गहरे शोक में हैं। भोपाल के भारत-भवन से बाहर स्वतंत्र रूप से नाटकों का मंचन करन...Read More

मानवीय विष को निष्क्रिय करना ही कला का मकसद और साध्य है ! – मंजुल भारद्वाज

नाटक “अनहद नाद – Unheard Sounds of Universe” नाटक होते हुए भी “जीवन” है और जीवन में घटित “नाटक” को हर पल उखाड़ फैंकता है .. कलाकार की कला , कलात्मकता और कला सत्व है ..उनका सृजन नाद है .. व्यक्तिगत सृजन दायरे को तोड़कर उसे यूनिवर्सल , ब्रह्मांडीय सृजन से जोड़ता है और कलाकार को देश , काल ,भाषा , धर्म से उन्मुक्त कर एक सृजनकार , एक क्रिएटर के रूप में घडता है . “अनहद नाद – Unheard sounds of Universe”…  कलात्मक चिंतन है, जो कला और कलाकारों की कलात्मक आवश्यकताओं,कलात्मक मौलिक प्रक्रियाओं को समझने और खंगोलने की प्रक्रिया है। क्योंकि कला उत्पाद और कलाकार उत्पादक नहीं है और जीवन नफा और नुकसान की बैलेंस शीट नहीं है इसलिए यह नाटक कला और कलाकार को उत्पाद और उत्पादिकरण से उन्मुक्त करते हुए,उनकी सकारात्मक,सृजनात्मक और कलात्मक उर्जा से बेहतर और सुंदर विश्व बनाने के लिए प्रेरित और प्र...Read More

मुकाम पोस्ट डेरू जिला नागौर

जेकेके में खेला गया हिटलर की फंतासी पर आधारित नाटक ग्राम डेरू में हिटलर का प्लेन गिरने से उथल-पुथल मंच से जैसे ही पर्दा उठता है सबसे पहले दिखाई देता है दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह एडॉल्फ हिटलर का ऑफिस। हिटलर की कुर्सी खाली है, उसके पास खड़ा है हिटलर का सहायक गोबेल्स। तभी हिटलर का प्रवेश होता है। वो जर्मन भाषा में गोबेल्स को कुछ निर्देश देता है जिसका जवाब भी गोबेल्स जर्मन में ही देता है। तभी मंच पार्श्व से घोषणा होती है कि अब इस नाटक के सभी विदेशी पात्र हिंदी में ही बातचीत करेंगे। इसके साथ ही दोनों के बीच हिंदी में बातचीत शुरू होती है। इसमें हिटलर के बात करने का अंदाज निराला है। इसमें उसे एक कॉमेडियन में रूप में पेश किया गया जो कि उसकी सनकी फितरत का भी प्रतीक है। वो कभी अजीब सी हरकतें करने लग जाता है तो कभी अपने ऑफिस की टेबल पर खड़ा होकर बोलने लग जाता है। हिटलर की यही हरकतें लोगों को खूब हं...Read More

एमपीएसडी का शाहकार : ‘हितकारी लीला’

संजय उपाध्याय निर्देशित ‘आनंद रघुनंदन’ एक देखने लायक नाट्य प्रस्तुति है। सन 1830 में रीवा के राजा विश्वनाथ सिंह द्वारा ब्रजभाषा में लिखित इस नाटक को हिंदी का पहला नाटक भी माना जाता है। प्रस्तुति के लिए रीवा के ही रहने वाले नाटककार योगेश त्रिपाठी ने इसका अनुवाद और संपादन वहीं की बघेली भाषा में किया है। ‘आनंद रघुनंदन’ में रामकथा को पात्रों के नाम बदलकर कहा गया है। राम का नाम यहाँ हितकारी है, लक्ष्मण का डीलधराधर, सीता का महिजा, परशुराम का रेणुकेय, दशरथ का दिगजान, केकैयी का कश्मीरी, सूर्पनखा का दीर्घनखी और रावण का दिकसिर, आदि। तरह-तरह के रंग-बिरंगे दृश्यों और गीत-संगीत से भरपूर यह प्रस्तुति एक अनछुए लेकिन पारंपरिक आलेख का शानदार संयोजन है। इसमें इतने तरह की दृश्य योजनाएँ इस गति के साथ शामिल हैं कि व्यक्ति मंत्रमुग्ध बैठा देखता रहता है। धनुषभंजन के दृश्य में पात्रों का एक समूह बैठने के तरीके को...Read More

नाटक : शकुन्तला की अंगूठी

भारत भवन में आयोजित राष्ट्रीय नाट्य समारोह की अन्तिम प्रस्तुति थी शकुन्तला की अंगूठी जिसे मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के कलाकारों ने वरिष्ठ रंगकर्मी और विद्यालय के प्राध्यापक आलोक चटर्जी के निर्देशन में मंचित किया। सुरेन्द्र वर्मा लिखित यह नाटक अव्यावसायिक रंगकर्मियों के एक समूह के पूर्वाभ्यास पर केन्द्रित है जो महाकवि कालिदास की रचना के मंचन की तैयारी कर रहा है। नाटक की कथावस्तु में विषयानुकूल पूर्वाभ्यास करने वाले कलाकारों, मुख्य कलाकार जो कि प्रमुख रूप से नाटक का सूत्रधार भी है, दृश्यों की रचना और संवादों को याद करने, दोहराने और समय-समय पर किसी कलाकार के न आ पाने या उसके बाद में आने की जगह को भरने का काम कर रहे हैं। कुमार, कनक, चमन, निरंजन, छोटू, मजदूर, सुदर्शन, मैनेजर, मंदाकिनी, रेखा, कुमार की मकान मालकिन सेठानी, नायिका की माँ के चरित्र एक बहुत अनगढ़ तरीके से एक नाटक को पूर्णता तक पहुँचान...Read More

इतालवी नाटककार दारियो फो का जाना

दारियो फ़ो ने 13 अक्टूबर को 90 वर्ष की उम्र में हमें अलविदा कह दिया। एक नाटककार के साथ-साथ वे एक अभिनेता, गायक, लेखक, बुद्धिजीवी, राजनीतिक एक्टिविस्ट, फ़ासीवाद-विरोधी मुहिम के योद्धा, एक असफल वास्तुविद, निर्देशक, अभिकल्पक और चित्रकार भी थे। वे एक कृतज्ञ पति और जीवनसाथी भी थे, जिन्होंने अपनी सहधर्मिणी की भूमिका को स्वीकार करने में कभी कंजूसी नहीं की। उनकी पत्नी फ्रैंका रामे स्वयं एक नाटककार, अभिनेत्री और नारीवादी एक्टिविस्ट थीं। उन्होंने फ़ो का हमेशा साथ दिया। फ़ो एक अच्छे पिता भी थे। वे बड़ी साफ़गोई के साथ स्वीकार करते थे कि उनका जीवन असाधारण रूप से भाग्यशाली था। लेकिन उनके लिये वही संज्ञा सबसे सटीक लगती है, जिसका इस्तेमाल वे हमेशा अपनी शख़्सियत को ज़ाहिर करने के लिये किया करते थे- मसखरा और विदूषक। फ़ो का सम्पूर्ण रचनालोक जीवन की विसंगतियों पर हंसने और उसकी भयावहता से एक हास्य के साथ मुठभेड़ करने पर...Read More

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” मानवता की कलात्मक हुंकार

नब्बे का दशक देश,दुनिया और मानवता के लिए आमूल बदलाव का दौर है। “औद्योगिक क्रांति” के पहिये पर सवार होकर मानवता ने सामन्तवाद की दासता से निकलने का ख्वाब देखा। पर नब्बे के दशक तक आते आते साम्यवाद के किले ढह गए और “औद्योगिक क्रांति” सर्वहारा की मुक्ति का मसीहा होने की बजाय पूंजीवाद का खतरनाक, घोर शोषणवादी और अमानवीय उपक्रम निकला जिसने सामन्ती सोच को ना केवल मजबूती दी अपितु विज्ञान के आविष्कार को तकनीक देकर भूमंडलीकरण के जरिये दुनिया को एक शोषित ‘गाँव’ में बदल दिया। ऐसे समय में भारत भी इन वैश्विक प्रक्रियाओं से अछुता नहीं था। एकध्रुवीय वैश्विक घटनाओं ने भारत की उत्पादक क्षमताओं को तहस नहस करना शुरू किया। अपने हकों की मांग करने वाले 66 हजार मिल मजदूरों को पूंजीवादी षड्यंत्र के तहत काम से निकाल दिया गया और मिलों पर ताला लग गया और मुंबई को सिंगापूर और शंघाई बनाने की साज़िश ...Read More

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