व्यक्तित्व

रंग कर्मियों के जत्थे उदास हैं

रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन के निधन के पश्चात उनके संबंध में विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन ने एक महत्वपूर्ण संस्मरण आलेख लिखा था। यह आलेख नागपुर से प्रकाशित लोकमत में 26 फरवरी 2012 को प्रकाशित हुआ था। – अंश पायन सिन्हा के फेसबुक टाइमलाइन  से… रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन ने चार दशकों तक निरंतर रंगकर्म करते हुए अनेक बेजोड़ नाटकों की प्रस्तुतियाँ देश भर में की हैं। उन्हें संगीत नाटक अकादमी का सर्वोच्च सम्मान भी मिला जो इसी वर्ष मार्च में दिल्ली में दिया जाना था, पर मृत्यु ने इसे संभव नहीं होने दिया। इसी 12 फरवरी को मात्र 64 वर्ष की उम्र में, भोपाल में उनका निधन हुआ। देश और मध्यप्रदेश में इस निधन से रंग कर्मियों को गहरा आघात लगा है। उनके अपने रंग-मंडल के अनगिनत सदस्य और पूरा वक्ती कार्यकर्त्ता गहरे शोक में हैं। भोपाल के भारत-भवन से बाहर स्वतंत्र रूप से नाटकों का मंचन करन...Read More

इतालवी नाटककार दारियो फो का जाना

दारियो फ़ो ने 13 अक्टूबर को 90 वर्ष की उम्र में हमें अलविदा कह दिया। एक नाटककार के साथ-साथ वे एक अभिनेता, गायक, लेखक, बुद्धिजीवी, राजनीतिक एक्टिविस्ट, फ़ासीवाद-विरोधी मुहिम के योद्धा, एक असफल वास्तुविद, निर्देशक, अभिकल्पक और चित्रकार भी थे। वे एक कृतज्ञ पति और जीवनसाथी भी थे, जिन्होंने अपनी सहधर्मिणी की भूमिका को स्वीकार करने में कभी कंजूसी नहीं की। उनकी पत्नी फ्रैंका रामे स्वयं एक नाटककार, अभिनेत्री और नारीवादी एक्टिविस्ट थीं। उन्होंने फ़ो का हमेशा साथ दिया। फ़ो एक अच्छे पिता भी थे। वे बड़ी साफ़गोई के साथ स्वीकार करते थे कि उनका जीवन असाधारण रूप से भाग्यशाली था। लेकिन उनके लिये वही संज्ञा सबसे सटीक लगती है, जिसका इस्तेमाल वे हमेशा अपनी शख़्सियत को ज़ाहिर करने के लिये किया करते थे- मसखरा और विदूषक। फ़ो का सम्पूर्ण रचनालोक जीवन की विसंगतियों पर हंसने और उसकी भयावहता से एक हास्य के साथ मुठभेड़ करने पर...Read More

हिमानी शिवपुरी : ऐसा नाम जिसने देखा हिंदी सिनेमा का बदलता हुआ दौर

हिमानी शिवपुरी को हाल ही में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। मन से कलाकार हिमानी के लिए यह भावपूर्ण क्षण था जब माननीय राष्ट्रपति ने उनको इस सम्मान से विभूषित किया। इस सम्मान के साथ ही वे एक लम्बे समय बाद प्रस्तुति के लिए रंगमंच की ओर लौटीं जहाँ से उनकी कलायात्रा शुरू हुई थी। सम्‍मान के प्रत्‍युत्‍तर में उन्‍होंने अकेली शीर्षक नाटक का मंचन भी किया। अस्सी के दशक में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय में स्नातक हिमानी ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए निरन्तर काम किया है, लम्बा संघर्ष किया है और अपने लगभग प्रत्येक किरदार को ऐसा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि वह दर्शकों की स्मृतियों से निकल न सके। वे जिस दौर में, जिस तैयारी और परिपक्वता के साथ टेलीविजन और सिनेमा माध्यम में सक्रिय हुईं थीं, उनके लिए सबसे स्वीकार्य यही था कि वे चरित्र भूमिकाओं को स्वीकार करें और उस दायरे क...Read More

प्रेम कहानी एक कवयित्री और चित्रकार की

भारत की लोकप्रिय कवयित्रियों में से एक अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था – “मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वो सब देवताओं को जगाने की कोशिश थी, उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं।” अमृता और इमरोज़ का सिलसिला धीरे-धीरे ही शुरू हुआ था। अमृता ने एक चित्रकार सेठी से अपनी किताब ‘आख़िरी ख़त’ का कवर डिज़ाइन करने का अनुरोध किया था। सेठी ने कहा कि वो एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो ये काम उनसे बेहतर कर सकता है। सेठी के कहने पर अमृता ने इमरोज़ को अपने पास बुलाया। उस ज़माने में वो उर्दू पत्रिका शमा में काम किया करते थे। इमरोज़ ने उनके कहने पर इस किताब का डिज़ाइन तैयार किया। इमरोज़ याद करते हैं, ”उन्हें डिज़ाइन भी पसंद आ गया और आर्टिस्ट भी। उसके बाद मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हो गया। हम दोनों पास ही रहते थे। मैं साउथ पटेल नगर में और वो वेस्ट पटेल नगर म...Read More

एक थे परसाई

उनसे यूँ तो ‘फेस टू फेस’ कभी मिलना नही हुआ। बस किताबों और अखबारों के मार्फ़त ही उनसे मुलाकात थी। उन्हें हाईस्कूल के दिनों में पहली बार पढ़ा तो लगा बायोलोजी की प्रयोगशाला में मेढक की जगह किसी ने समाज को रख दिया है। चीर फाड़ कर आँत-अंतडिया सब बाहर बिखेर दी और बता दिया कि ये है अंदर की सच्चाई। कोई अलीबाबा था जो कहता था खुल जा सिम सिम और छुपे खजानों के दानवी दरवाजे खुल जाते थे सो हम भी जिन्दगी के पेच फसने पर परसाई की तरफ देखते और पेच मानो उल्टा घूमना शुरू हो जाता। हमारे घर, पड़ोस ,दुकान और दफ्तर सब की शक्ल यहाँ देखी पहचानी जा सकती थी। ‘वैष्णव की फिसलन’ वाला बनिया हमारे मोहल्ले का ही पंजवानी सेठ था। ‘तट की खोज’ वाली शीला बुआ में अपने मित्र की बड़ी बहन दिखती थी। ‘ दो नाक वाले लोग’ को पढ़ता तो अपने माँ पिता की याद आने लगती और ‘ठंडा शरीफ आदमी’ तो मानो मेरा अपना ही बयां था। छोटे छोटे वा...Read More

मैं वो नहीं जो दिखता हूँ, मैं वो हूँ जो लिखता हूँ – मानव कौल

‘मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। मैं हूं जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाॅक्स लटका।’ यह परिचय ‘मौन में बात’ नाम के ब्लॉग के लेखक का है। लिखने का शौक रखने वाले इस शख्स के लिए रंगमंच जिंदगी है और अभिनय सांसें। ये एक ऐसे नाट्यकर्मी हैं जिनमें अपने काम को लेकर बेचैनी नजर आती है। एक ही तरह का काम इन्हें बोरियत से भर देता है। इसलिए वे प्रयोगों पर विश्वास करते हैं। रंगमंच से शुरू हुआ उनका सफर सिनेमा तक पहुंच गया है। उनसे बातचीत करना आपको रोमांच से भर देता है। अभिनय की दुनिया में इन्हें मानव कौल के नाम से जाना जाता है। कश्मीर के बारामुला में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे मानव कौल का बचपन मध्य प्रदेश के होशंगाबाद शहर में बीता। 90 के दशक में घाटी में तेजी से पांव पसारते आतंकवाद की वजह से उनके परिवार को पलायन करके होशंगाबाद आना पड़ा। उनके पिता ...Read More

स्मृतिशेषः पणिक्कर का जाना

जयदेव तनेजाः हाल में मलयालम/ भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण शिखर-पुरुष कावलम नारायण पणिक्कर के निधन की सूचना तक देना हिंदी/ राष्ट्रीय मीडिया ने जरूरी नहीं समझा- यह देख कर दुख हुआ। हाल में मलयालम/ भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण शिखर-पुरुष कावलम नारायण पणिक्कर के निधन की सूचना तक देना हिंदी/ राष्ट्रीय मीडिया ने जरूरी नहीं समझा- यह देख कर दुख हुआ। इन्होंने मलयालम के साथ-साथ संस्कृत और हिंदी में समान कुशलता और प्रवीणता और प्रभावशीलता के साथ अपने मौलिक और सार्थक रंग-प्रयोग किए। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी और पूरे परिवार ने निर्णय किया कि उनके अट्ठासी वर्षीय रंग-समृद्ध जीवन का उत्सव मनाया जाए- न कि मृत्यु का दुख। इसलिए जब तक शव को घर पर रखा गया और परिजन, प्रशंसक और परिचित-मित्र उनके अंतिम दर्शनों के लिए रहे, तब तक उस कक्ष के एक कोने में उनकी नाट्य-संस्था ‘सोपानम’ के सभी गायक कलाकार पणिक्कर र...Read More

अब्बास किरोस्तामी का सिनेमा

मशहूर ईरानी फिल्मकार अब्बास किरोस्तामी का पिछली चार जुलाई को निधन हो गया। उन्हें ईरानी सिनेमा का सत्यजीत रे कहा जाता है। उनकी फिल्म-यात्रा को याद कर रहे हैं अजित राय। किरोस्तामी का सिनेमा कम से कम चीजों और वृत्तचित्र शैली में जीवन और मृत्यु के दार्शनिक सवालों की पड़ताल करता है। वे कई बार जादुई यथार्थवाद का प्रयोग करते हैं जिसके बारे में गैब्रिएल गार्सिया मारखेज का कहना है कि कला में इसकी उत्पत्ति इतालवी फिल्मकार वित्तोरियो दे सिका की फिल्म, ‘मिराकल इन मिलान’ (1950) से मानी जा सकती है। दुनिया भर के फिल्मप्रेमियों के लिए सुप्रसिद्ध ईरानी फिल्मकार अब्बास किरोस्तामी के निधन की खबर किसी सदमे से कम नहीं है। मशहूर जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसावा का कथन याद आ रहा है, ‘जब सत्यजीत रे का निधन हुआ था तो अपना दुख व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। पर जब मैंने अब्बास किरोस्तानी की फिल्में देखीं तो ...Read More

शिवमूर्ति: वंचितों की पीड़ा का किस्सागो

कथा साहित्य में एक आश्चर्य की तरह हैं शिवमूर्ति. आलोचक और संपादक लगभग आरोप की तरह कहते हैं कि इतना कम लिखकर इतनी अधिक ख्याति! पाठकों के बीच ऐसा अपनापा कितनों को हासिल होता है. और शिवमूर्ति से कभी किसी ने इस बाबत जानना चाहा तो उन्होंने जवाब दिया, “मुझे तो कभी-कभी लगता है कि मैं लेखक ही नहीं हूं. कभी लिख दिया तो लिख दिया. गाहे बगाहे का लेखन भी कोई लेखन है.” जीवन और साहित्य में यही सादगी और सहजता शिवमूर्ति की ताकत है. 11 मार्च, 1950 को सुलतानपुर (उत्तर प्रदेश) के कुरंग गांव में जन्मे शिवमूर्ति जन्मजात किस्सागो हैं. पहली कहानी 13 साल की उम्र में लिख डाली थी. गांव जवार के उनके बालसखा बताते हैं कि किसी घटना को शिवमूर्ति इस अंदाज में सुनाते थे कि सब कुछ जैसे सामने आ खड़ा हुआ हो. उनका शुरुआती जीवन बड़ा बीहड़ था. पिता बचपन में ही घर का भार इनके कंधों पर डाल संन्यासी की तरह स्वच्छंद हो गए थे. खेती, पढ़ा...Read More

मोहन राकेश

मोहन राकेश (8 जनवरी 1925 – 3 जनवरी, 1972) नई कहानी आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर थे। पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए किया। जीविकोपार्जन के लिये अध्यापन। कुछ वर्षो तक ‘सारिका’ के संपादक। ‘आषाढ़ का एक दिन’,’आधे अधूरे’ और लहरों के राजहंस के रचनाकार। ‘संगीत नाटक अकादमी’ से सम्मानित। ३ जनवरी १९७२ को नयी दिल्ली में आकस्मिक निधन। मोहन राकेश हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और उपन्यासकार हैं। समाज के संवेदनशील व्यक्ति और समय के प्रवाह से एक अनुभूति क्षण चुनकर उन दोनों के सार्थक सम्बन्ध को खोज निकालना, राकेश की कहानियों की विषय-वस्तु है। मोहन राकेश की डायरी हिंदी में इस विधा की सबसे सुंदर कृतियों में एक मानी जाती है। मोहन राकेश को कहानी के बाद सफलता नाट्य-लेखन के क्षेत्र में मिली| हिंदी नाटकों में भारतेंदु और प्रसाद क...Read More

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