विविध

रंगमंच का प्यादा

बैकग्राउंड में बांसुरी का संगीत बज रहा है.. स्टेज पर एक आराम कुर्सी पड़ी है.. जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं बची है.. सब लोग व्यस्त है.. परदे पर आसमान भी बनाया हुआ है.. मगर उसमे अभी रात है.. आठ दस तारे बने हुए है परदे पर.. और कोने में एक चाँद पड़ा ऊंघ रहा है.. सामने दर्शक है. जो ताली बजाने से लेकर उबासी लेने तक का काम कुशलता से अंजाम दे सकते है.. “ये कैसी विडम्बना है कि जब मैं गलत था तो सब मेरे साथ थे पर अब जब मैं सच का साथ देना चाहता हूँ तो कोई मेरी बात सुनने को भी तैयार नहीं..” बैक ग्राउंड से आवाज़ आयी है और लाल रंग की मद्धिम रौशनी स्टेज पर उतरी है.. इसी रौशनी में एक दाढ़ी वाला चेहरा नमूदार होता है.. “मैं पूछता हु आखिर क्यों..?” संवाद अदायगी में इसका कोई सानी नहीं.. आँखों में जला देने वाली आग और माथे पर भिगो देने वाला पसीना.. रेड स्पोट लाईट ठीक उसके चेहरे पर और आँखे ऐसी लाल के जैसे लहू उतर आ...Read More

प्रेम कहानी एक कवयित्री और चित्रकार की

भारत की लोकप्रिय कवयित्रियों में से एक अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था – “मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वो सब देवताओं को जगाने की कोशिश थी, उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं।” अमृता और इमरोज़ का सिलसिला धीरे-धीरे ही शुरू हुआ था। अमृता ने एक चित्रकार सेठी से अपनी किताब ‘आख़िरी ख़त’ का कवर डिज़ाइन करने का अनुरोध किया था। सेठी ने कहा कि वो एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो ये काम उनसे बेहतर कर सकता है। सेठी के कहने पर अमृता ने इमरोज़ को अपने पास बुलाया। उस ज़माने में वो उर्दू पत्रिका शमा में काम किया करते थे। इमरोज़ ने उनके कहने पर इस किताब का डिज़ाइन तैयार किया। इमरोज़ याद करते हैं, ”उन्हें डिज़ाइन भी पसंद आ गया और आर्टिस्ट भी। उसके बाद मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हो गया। हम दोनों पास ही रहते थे। मैं साउथ पटेल नगर में और वो वेस्ट पटेल नगर म...Read More

एक थे परसाई

उनसे यूँ तो ‘फेस टू फेस’ कभी मिलना नही हुआ। बस किताबों और अखबारों के मार्फ़त ही उनसे मुलाकात थी। उन्हें हाईस्कूल के दिनों में पहली बार पढ़ा तो लगा बायोलोजी की प्रयोगशाला में मेढक की जगह किसी ने समाज को रख दिया है। चीर फाड़ कर आँत-अंतडिया सब बाहर बिखेर दी और बता दिया कि ये है अंदर की सच्चाई। कोई अलीबाबा था जो कहता था खुल जा सिम सिम और छुपे खजानों के दानवी दरवाजे खुल जाते थे सो हम भी जिन्दगी के पेच फसने पर परसाई की तरफ देखते और पेच मानो उल्टा घूमना शुरू हो जाता। हमारे घर, पड़ोस ,दुकान और दफ्तर सब की शक्ल यहाँ देखी पहचानी जा सकती थी। ‘वैष्णव की फिसलन’ वाला बनिया हमारे मोहल्ले का ही पंजवानी सेठ था। ‘तट की खोज’ वाली शीला बुआ में अपने मित्र की बड़ी बहन दिखती थी। ‘ दो नाक वाले लोग’ को पढ़ता तो अपने माँ पिता की याद आने लगती और ‘ठंडा शरीफ आदमी’ तो मानो मेरा अपना ही बयां था। छोटे छोटे वा...Read More

शिवमूर्ति: वंचितों की पीड़ा का किस्सागो

कथा साहित्य में एक आश्चर्य की तरह हैं शिवमूर्ति. आलोचक और संपादक लगभग आरोप की तरह कहते हैं कि इतना कम लिखकर इतनी अधिक ख्याति! पाठकों के बीच ऐसा अपनापा कितनों को हासिल होता है. और शिवमूर्ति से कभी किसी ने इस बाबत जानना चाहा तो उन्होंने जवाब दिया, “मुझे तो कभी-कभी लगता है कि मैं लेखक ही नहीं हूं. कभी लिख दिया तो लिख दिया. गाहे बगाहे का लेखन भी कोई लेखन है.” जीवन और साहित्य में यही सादगी और सहजता शिवमूर्ति की ताकत है. 11 मार्च, 1950 को सुलतानपुर (उत्तर प्रदेश) के कुरंग गांव में जन्मे शिवमूर्ति जन्मजात किस्सागो हैं. पहली कहानी 13 साल की उम्र में लिख डाली थी. गांव जवार के उनके बालसखा बताते हैं कि किसी घटना को शिवमूर्ति इस अंदाज में सुनाते थे कि सब कुछ जैसे सामने आ खड़ा हुआ हो. उनका शुरुआती जीवन बड़ा बीहड़ था. पिता बचपन में ही घर का भार इनके कंधों पर डाल संन्यासी की तरह स्वच्छंद हो गए थे. खेती, पढ़ा...Read More

मोहन राकेश

मोहन राकेश (8 जनवरी 1925 – 3 जनवरी, 1972) नई कहानी आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर थे। पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए किया। जीविकोपार्जन के लिये अध्यापन। कुछ वर्षो तक ‘सारिका’ के संपादक। ‘आषाढ़ का एक दिन’,’आधे अधूरे’ और लहरों के राजहंस के रचनाकार। ‘संगीत नाटक अकादमी’ से सम्मानित। ३ जनवरी १९७२ को नयी दिल्ली में आकस्मिक निधन। मोहन राकेश हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और उपन्यासकार हैं। समाज के संवेदनशील व्यक्ति और समय के प्रवाह से एक अनुभूति क्षण चुनकर उन दोनों के सार्थक सम्बन्ध को खोज निकालना, राकेश की कहानियों की विषय-वस्तु है। मोहन राकेश की डायरी हिंदी में इस विधा की सबसे सुंदर कृतियों में एक मानी जाती है। मोहन राकेश को कहानी के बाद सफलता नाट्य-लेखन के क्षेत्र में मिली| हिंदी नाटकों में भारतेंदु और प्रसाद क...Read More

हमारे अनुभव से ही बनता है नाटक

अरविंद गौड़ से आशीष कुमार ‘अंशु’ की बातचीत हिन्दी थिएटर में रूचि रखने वालों के लिए अरविन्द गौड़ का नाम जाना पहचाना है. तुगलक (गिरिश कर्नाड), कोर्ट मार्शल (स्वदेश दीपक), हानूश (भीष्म साहनी) और धर्मवीर भारती की अंधा युग जैसे दर्जनों नाटकों के सैकड़ो शो उन्होंने किए हैं. ‘कोर्ट मार्शल’ का ही अब तक लगभग पांच सौ बार प्रदर्शन हो चुका है. पुलिस की कस्टडी में होने वाली मौत हो या पारिवारिक हिंसा, लड़कियों के साथ छेड़छाड़, यौन हिंसा हो या फिर घर के काम के लिए आदिवासी इलाकों से लाई जाने वाली महिलाओं का उत्पीड़न, ये सारे मुद्दे बार-बार अरविन्द गौड़ के नाटकों में प्रश्न बनकर सामने आते हैं. अरविन्द गौड़ के लिए थिएटर, मन विलास का साधन नहीं बल्कि परिवर्तन का टूल है. प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश. आपके नाटकों से और थिएटर एक्टिविज्म से आम तौर पर इसमें रूचि रखने वाले लोग परिचित हैं लेकिन आपके बचपन से कम लोगों का ...Read More

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