साहित्य

अमृता प्रीतम की आत्मकथा – ‘रसीदी टिकट’

“मेरी सारी रचनाएं, क्या कविता, क्या कहानी और क्या उपन्यास, मैं जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की तरह हैं। मेरी दुनिया की हकीकत ने मेरे मन के सपने से इश्क किया और उनके वर्जित मेल से यह सब रचनाएं पैदा हुईं। जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की किस्मत इसकी किस्मत है और इसे सारी उम्र अपने साहित्यिक समाज के माथे के बल भुगतने हैं। मन का सपना क्या था, इसकी व्याख्या में जाने की आवश्यकता नहीं है। यह कम्बख्त बहुत हसीन होगा, निजी जिन्दगी से लेकर कुल आलम की बेहतरी तक की बातें करता होगा, तब भी हकीकत अपनी औकात को भूलकर उससे इश्क कर बैठी और उससे जो रचनाएं पैदा हुईं, हमेशा कुछ कागजों में लावारिस भटकती रहीं…” यह है अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ का एक अंश, जो उनके शब्दों में उनकी समूची जीवनी का सार है। वे जानती थीं कि उनके मुक्त व स्वतन्त्र व्यक्तित्व को पुरातनपंथी समाज पचा नहीं सकेगा, लेकिन फिर भी उन्होने स्वय...Read More

प्रेम कहानी एक कवयित्री और चित्रकार की

भारत की लोकप्रिय कवयित्रियों में से एक अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था – “मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वो सब देवताओं को जगाने की कोशिश थी, उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं।” अमृता और इमरोज़ का सिलसिला धीरे-धीरे ही शुरू हुआ था। अमृता ने एक चित्रकार सेठी से अपनी किताब ‘आख़िरी ख़त’ का कवर डिज़ाइन करने का अनुरोध किया था। सेठी ने कहा कि वो एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो ये काम उनसे बेहतर कर सकता है। सेठी के कहने पर अमृता ने इमरोज़ को अपने पास बुलाया। उस ज़माने में वो उर्दू पत्रिका शमा में काम किया करते थे। इमरोज़ ने उनके कहने पर इस किताब का डिज़ाइन तैयार किया। इमरोज़ याद करते हैं, ”उन्हें डिज़ाइन भी पसंद आ गया और आर्टिस्ट भी। उसके बाद मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हो गया। हम दोनों पास ही रहते थे। मैं साउथ पटेल नगर में और वो वेस्ट पटेल नगर म...Read More

कविता भाषा में मनुष्य होने की तमीज है..!

जब हम साहित्य या साहित्य की किसी विधा की बात करते हैं, तो हमें उसके इतिहास के साथ साथ समग्रता में उसके विकास की बात भी करनी होगी। यहां जब हम उत्तर शती की हिंदी कविता पर बात करते हुए समाज और संवेदना के बरक्स कविता की क्या भूमिका रही और कविता पर क्या प्रभाव पड़े यह भी देखना पड़ेगा। किसी भी विषय पर बात करते समय हम यह तय भलें ही कर दें कि उत्तर शती पर बात करें, लेकिन हमें पीछे भी जाना होगा। देखना होगा कि आखिर यह यात्रा उत्तर शती तक किस तरह आई होगी। तभी हम मुकम्मल समझ विषय के बारे में बना पाएंगे। फिर यह भी है कि हमारा समाज, देश और यह विश्व भी तो उस साहित्य या कला के समानान्तर अपनी दूरी तय करते हैं और एक दूसरे पर प्रभाव भी डालते हैं। कविता की बात करें तो कविता अपने समय का सन्दर्भ होती है। हम उसमें वह समय देख सकते हैं जब उसकी रचना हुई। उस समय का समाज और उसके भीतर की हलचल सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, ...Read More

आधे-अधूरे – मोहन राकेश

का.सू.वा. (काले सूटवाला आदमी) जो कि पुरुष एक, पुरुष दो, पुरुष तीन तथा पुरुष चार की भूमिकाओं में भी है। उम्र लगभग उनचास-पचास। चेहरे की शिष्टता में एक व्यंग्य। पुरुष एक के रूप में वेशान्तर : पतलून-कमीज। जिंदगी से अपनी लड़ाई हार चुकने की छटपटाहट लिए। पुरुष दो के रूप में : पतलून और बंद गले का कोट। अपने आपसे संतुष्ट, फिर भी आशंकित। पुरुष तीन के रूप में : पतलून-टीशर्ट। हाथ में सिगरेट का डिब्बा। लगातार सिगरेट पीता। अपनी सुविधा के लिए जीने का दर्शन पूरे हाव-भाव में। पुरुष चार के रूप में : पतलून के साथ पुरानी कोट का लंबा कोट। चेहरे पर बुजु़र्ग होने का खासा एहसास। काइयाँपन। स्त्री। उम्र चालीस को छूती। चेहरे पर यौवन की चमक और चाह फिर भी शेष। ब्लाउज और साड़ी साधारण होते हुए भी सुरुचिपूर्ण। दूसरी साड़ी विशेष अवसर की। बड़ी लड़की। उम्र बीस से ऊपर नहीं। भाव में परिस्थितियों से संघर्ष का अवसाद और उतावलापन।...Read More

तिरिया चरित्तर – शिवमूर्ति

”विमली! ए विमली!… एकदम्मै मर गर्इ का रे…” जोर लगाते ही बुढ़िया को खाँसी आ जाती है। ”यह हरजार्इ तो खटिया पर गिरते ही मर जाती है।” – बुढ़िया खटिया के पास जाकर विमली को झिंझोड़ने लगी, ”मरघट ले चलौं का रे?” हड़बड़ाकर उठती है विमली और आँख मींजते हुए झोंपड़ी के बाहर चली जाती है। लौटती है तो चूल्हे पर ‘चाह’ का पानी चढ़ाकर बकरी दुहने लगती है। सात साल पहले, जब पहली बार उसने भट्‌ठे पर मजूरी करना शुरू किया था, नौ-दस साल की उमर में, तो कमार्इ के शुरूआत के पैसों से इस बकरी की माँ को खरीदकर लार्इ थी वह। बाप के लिए ‘चाह’ का इंतजाम! और अब तो उसके बाप को चाह की ऐसी आदत पड़ गर्इ है कि बिना ‘चाह’ के उसका लोटा ही नहीं उठता। इसी चाह के चलते बाप-बेटी को बुढ़िया की ‘बोली’ सुननी पड़ती है। माँ-बाप को चाह का गिलास ...Read More

भरतनाट्‌यम – शिवमूर्ति

”अभी भी तुझे भिनसार नहीं हुआ है क्या रे?” बाप का क्रोध और घृणा से चिलचिलाता हुआ स्वर कानों में पड़ता है तो मैं झट से चादर फेंककर उठ बैठता हूँ। बस एक मिनट की देर हो गर्इ। सोच ही रहा था कि अब उठूँ, अब उठूँ। पर उससे कोर्इ फर्क नहीं पड़ना था। डाँट खाने का यह मौका बचा लेता तो वे कोर्इ और मौका ढूँढ़ निकालते, बल्कि डाँटने का एक चांस खो देने की चिढ़ उन्हें और भी आक्रामक बना जाती। जिसने गाली-फटकार सुनाने की कसम ही खा ली हो, उससे कब तक भागा जा सकता है? उन्हें तो मेरे उठने, बैठने, देखने, चलने, यहाँ तक कि आँखों की पलकें उठाने-गिराने के ढंग तक में खराबी नजर आने लगी है… ”साला, चलता कैसे है, शोहदों की तरह! चलता है तो चलता है, साथ में सारी देह क्यों ऐंठे डालता है, दरिद्रता के लच्छन हैं ये, घोर दरिद्रता के। माँगी भीख भी मिल जाए इस हरामखोर को तो इसकी पेशाब से मूँछ मुँड़ा दूँगा…...Read More

ख्वाजा, ओ मेरे पीर – शिवमूर्ति

माधोपुर से शिवगढ़ तक सड़क पास हो गयी। तो सरकार ने आखिर मान ही लिया कि ऊसर जंगल का यह इलाका भी हिन्दुस्तान का ही हिस्सा है। पिछले पचास बरस में कितनी दरखास्तें दी गयीं। दरखास्त देने वाले नौजवान बूढ़े हो चले तब जाकर…. चलो सुध तो आयी, वरना छ सात किमी. लम्बी इस पट्‌टी पर आबादी कहाँ है। एक भी गाँव अगर होता रास्ते में। विधायक को हजार दो हजार वोट का भी लालच होता। दो जिलों की सीमा होने के चलते भी यह हिस्सा उपेक्षित रह गया। मामा के घर से निकलते ही मामी के जिले की शुरूआत हो जाती है। मामा का घर एक जिले में और सामने के खेतों में से आधे दूसरे जिले में। लेकिन पक्की सड़क के लिए चिह्नित यह रास्ता पहले भी कभी राहगीरों से खाली नहीं रहा। टेढ़ी मेढ़ी पगडंडी के रूप में, नाले जंगल और ऊसर के बीच से गुजरते इस रास्ते पर चलते पीढ़ियाँ गुजर गयीं। बड़ी-बड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ इस रास्ते पर घटित हुईं। कभी गौना कराकर ...Read More

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