बात-मुलाक़ात

रंगमंच पढऩे से ज्यादा करने की कला है : अनूप त्रिवेदी

नाटक की तरफ रुझान कैसे हुआ? मेरा गांव एटा जिले में था- पूरब में पटियाली, जहां अमीर खुसरो का जन्म हुआ और पश्चिम में सोरों, जहां तुलसीदास का जन्म हुआ। बचपन में सोचता था कलक्टर बन जाऊं तो लोग बड़ा आदमी मान लेंगे। फिर लगा नहीं कलाकार सबसे बड़ा होता है। उन्हीं दिनों टीवी पर अनुपम खेर का इंटरव्यू देखा जिसमें उन्होंने लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादमी का जिक्र किया था। मैं अपने मित्र की मदद से वहां पहुंचा। वहीं नवाजुद्दीन सिद्दीकी और अन्य मित्रों से मुलाकात हुई। १९९१ में पहली बार दिल्ली पहुंचा। एनएसडी देखा। वहां विजय शुक्ला भाई मिले और उनसे मिलना मेरे लिए बहुत बड़े सौभाग्य की बात थी। इधर आपने मशहूर अफसानानिगार मंटो पर नाटक लिखा है। यह विचार कैसे आया? मंटो हमेशा मेरे पसंदीदा रहे हैं। मैं उनको बार-बार पढ़ता हूं और अपने करीब पाता हूं। बात तब की है जब मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में बतौर अभिनेता काम कर ...Read More

हिमानी शिवपुरी : ऐसा नाम जिसने देखा हिंदी सिनेमा का बदलता हुआ दौर

हिमानी शिवपुरी को हाल ही में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। मन से कलाकार हिमानी के लिए यह भावपूर्ण क्षण था जब माननीय राष्ट्रपति ने उनको इस सम्मान से विभूषित किया। इस सम्मान के साथ ही वे एक लम्बे समय बाद प्रस्तुति के लिए रंगमंच की ओर लौटीं जहाँ से उनकी कलायात्रा शुरू हुई थी। सम्‍मान के प्रत्‍युत्‍तर में उन्‍होंने अकेली शीर्षक नाटक का मंचन भी किया। अस्सी के दशक में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय में स्नातक हिमानी ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए निरन्तर काम किया है, लम्बा संघर्ष किया है और अपने लगभग प्रत्येक किरदार को ऐसा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि वह दर्शकों की स्मृतियों से निकल न सके। वे जिस दौर में, जिस तैयारी और परिपक्वता के साथ टेलीविजन और सिनेमा माध्यम में सक्रिय हुईं थीं, उनके लिए सबसे स्वीकार्य यही था कि वे चरित्र भूमिकाओं को स्वीकार करें और उस दायरे क...Read More

मैं वो नहीं जो दिखता हूँ, मैं वो हूँ जो लिखता हूँ – मानव कौल

‘मेरा कोई स्वार्थ नहीं, न किसी से बैर, न मित्रता। मैं हूं जैसे- चौराहे के किनारे पेड़ के तने से उदासीन वैज्ञानिक सा लेटर-बाॅक्स लटका।’ यह परिचय ‘मौन में बात’ नाम के ब्लॉग के लेखक का है। लिखने का शौक रखने वाले इस शख्स के लिए रंगमंच जिंदगी है और अभिनय सांसें। ये एक ऐसे नाट्यकर्मी हैं जिनमें अपने काम को लेकर बेचैनी नजर आती है। एक ही तरह का काम इन्हें बोरियत से भर देता है। इसलिए वे प्रयोगों पर विश्वास करते हैं। रंगमंच से शुरू हुआ उनका सफर सिनेमा तक पहुंच गया है। उनसे बातचीत करना आपको रोमांच से भर देता है। अभिनय की दुनिया में इन्हें मानव कौल के नाम से जाना जाता है। कश्मीर के बारामुला में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे मानव कौल का बचपन मध्य प्रदेश के होशंगाबाद शहर में बीता। 90 के दशक में घाटी में तेजी से पांव पसारते आतंकवाद की वजह से उनके परिवार को पलायन करके होशंगाबाद आना पड़ा। उनके पिता ...Read More

हमारे अनुभव से ही बनता है नाटक

अरविंद गौड़ से आशीष कुमार ‘अंशु’ की बातचीत हिन्दी थिएटर में रूचि रखने वालों के लिए अरविन्द गौड़ का नाम जाना पहचाना है. तुगलक (गिरिश कर्नाड), कोर्ट मार्शल (स्वदेश दीपक), हानूश (भीष्म साहनी) और धर्मवीर भारती की अंधा युग जैसे दर्जनों नाटकों के सैकड़ो शो उन्होंने किए हैं. ‘कोर्ट मार्शल’ का ही अब तक लगभग पांच सौ बार प्रदर्शन हो चुका है. पुलिस की कस्टडी में होने वाली मौत हो या पारिवारिक हिंसा, लड़कियों के साथ छेड़छाड़, यौन हिंसा हो या फिर घर के काम के लिए आदिवासी इलाकों से लाई जाने वाली महिलाओं का उत्पीड़न, ये सारे मुद्दे बार-बार अरविन्द गौड़ के नाटकों में प्रश्न बनकर सामने आते हैं. अरविन्द गौड़ के लिए थिएटर, मन विलास का साधन नहीं बल्कि परिवर्तन का टूल है. प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश. आपके नाटकों से और थिएटर एक्टिविज्म से आम तौर पर इसमें रूचि रखने वाले लोग परिचित हैं लेकिन आपके बचपन से कम लोगों का ...Read More

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