सिनेमा

एक म्यूज़िकल स्केच है – जग्गा जासूस

एक गाँव का ,लकड़ी से बने घर का हॉस्पिटल और हॉस्टल के बीच गुजरी दुनिया का जिसमे अपना वज़ूद तलाशता अधूरा बच्चा है बोलने वाली इस दुनिया में वो अधूरा है क्यूंकि दुनिया की तरह नहीं बोल पाता। हॉस्पिटल में दया से उपजे स्नेह की कमी नहीं है पर बचपन को बैठकर सुनने का वक़्त किसी के पास नहीं है इसलिए वे कहना छोड़ देता है सुनने का वक़्त सिर्फ अपनों के पास होता है। इत्तेफ़ाक़ का एक रेड सर्कल है ,एक दायरा जो उसके आस पास खिंचता है उसमे मिला एक अजनबी उसे बैठकर सुनता है ,सुनने से उसमे हौसला जगता है कहने का। उसकी लड़ाई लफ्ज़ो से है वो अपनी लड़ाई लड़ना सीख गया है ,कहना सीख गया है ,लोग उसे सुनने लगे है। ज़िंदगी में स्नेह और दया से अलग एक और प्यार होता है बिना शर्त वो उसे पहचानने लगा है पर इत्तेफ़ाक़ के सर्कल की एक लिमिट है वो जल्दी पूरा होता है ,कभी कभी वक़्त से पहले। इस दफे उसकी ज़िंदगी में हॉस्टल है ,छोटे से कसबे में एक हॉस...Read More

अब्बास किरोस्तामी का सिनेमा

मशहूर ईरानी फिल्मकार अब्बास किरोस्तामी का पिछली चार जुलाई को निधन हो गया। उन्हें ईरानी सिनेमा का सत्यजीत रे कहा जाता है। उनकी फिल्म-यात्रा को याद कर रहे हैं अजित राय। किरोस्तामी का सिनेमा कम से कम चीजों और वृत्तचित्र शैली में जीवन और मृत्यु के दार्शनिक सवालों की पड़ताल करता है। वे कई बार जादुई यथार्थवाद का प्रयोग करते हैं जिसके बारे में गैब्रिएल गार्सिया मारखेज का कहना है कि कला में इसकी उत्पत्ति इतालवी फिल्मकार वित्तोरियो दे सिका की फिल्म, ‘मिराकल इन मिलान’ (1950) से मानी जा सकती है। दुनिया भर के फिल्मप्रेमियों के लिए सुप्रसिद्ध ईरानी फिल्मकार अब्बास किरोस्तामी के निधन की खबर किसी सदमे से कम नहीं है। मशहूर जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसावा का कथन याद आ रहा है, ‘जब सत्यजीत रे का निधन हुआ था तो अपना दुख व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। पर जब मैंने अब्बास किरोस्तानी की फिल्में देखीं तो ...Read More

फिल्म समीक्षा – उड़ता पंजाब

तमाम विवादो के बाद रिलीज होने वाली ‘उड़ता पंजाब’ को सीधे सीधे ‘शंघाई’ और ‘ओह माय गॉड’ की श्रेणी मे रखा जा सकता है, ट्रीटमेंट की वजह से नहीं, विषय की तरफ अपनी अप्रोच की वजह से। ‘उड़ता पंजाब’ विशेष बन पड़ी है, कलाकारो के विशेष अभिनय से, कुछ बेहद विशेष संगीत से और कहीं कहीं अपनी असाधारण सिनेमेटोग्राफी से। हालांकि सेंसर बोर्ड के साथ हुये सारे विवाद के चलते आम दर्शको का ध्यान उन चीजों की तरफ ज्यादा आकृष्ट हो गया, जो की वस्तुतः सिनेमा हाल मे एक सरप्राइज़ के तौर पर मिलनी थी, या जिन का उपयोग प्रमोशन के दौरान दर्शको के मन मे जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए किया जाना था। हालांकि न्यायालय ने अपना फैसला भी दे दिया और सब पक्षो ने उसे मान भी लिया। लेकिन फिर भी बड़ी आसानी से समझा जा सकता है की कुछ जगहो पर उपयोग की गयी अश्लील शब्दावलियों से सहज ही बचा जा सकता था। कि...Read More

शोरगुल

कलाकार – जिम्मी शेरगिल, आशुतोष राणा, सुहा गोजेन, संजय सूरी, हितेन तेजवानी, एजाज खान निर्देशक – प्रणव कुमार सिंह, जितेंद्र तिवारी   पिछले हफ्ते रिलीज होने वाली यह फिल्म ऐन वक्त पर एक हफ्ते के लिए आगे इस वजह से टली कि यूपी के कई सिनेमाघरों ने फिल्म को अपने यहां लगाने से इनकार कर दिया था। कहा जा रहा था कि फिल्म में हिंदु-मुस्लिम दंगों के सीन की भरमार है और साथ कहानी के किरदारों का नाम यूपी सरकार के नेताओं से मिलते-जुलते हैं। इस फिल्म में प्रदेश के सीएम का नाम मिथिलेश आपको यूपी के सीएम की याद दिलाएगा तो फिल्म में होम मिनिस्टर बने आलम खान का नाम भी आपको यूपी के बड़े नेता की याद दिलाता है। ऐसा लगता है कि सेंसर बोर्ड इस बार फिल्म पर न जाने क्यों कुछ ज्यादा मेहरबान रहा तभी तो फिल्म में कई भड़काऊ संवादों को पास किया गया तो दंगों के कई सीन भयानक होने के बावजूद सेंसर ने पास किए। कहान...Read More

सिनेमा : सत्तर का सिनेमा और गुलज़ार

हिंदी फिल्मों के लंबे इतिहास में सत्तर का दशक विविध धाराओं की महत्त्वपूर्ण फिल्मों के लिए जाना जाएगा। फिल्म इस उद्देश्य से भी बनाई जा सकती है कि व्यावसायिक लाभ प्राथमिक शर्त न हो। सत्तर के दशक का हिंदी सिनेमा सोद्देश्य, स्वच्छ, कलात्मक मनोरंजन और गैरजिम्मेदार, मुनाफाखोर और निकृष्ट मनोरंजन के बीच संघर्ष की कहानी है। फिल्म को साहित्य, नाटक, संगीत, चित्रकला, फोटोग्राफी आदि अन्य कलाओं का एक बेहद असरदार, संश्लिष्ट माध्यम मानते हुए मुख्यधारा फिल्मों के सामांतर एक आंदोलन भारत के विभिन्न प्रदेशों में, बिना किसी गोलबंदी के विकसित हुआ था। समांतर फिल्मों के इन निर्देशक-निर्माताओं का मानना था कि बेहतर जनरुचि के विकास में फिल्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, साथ ही सामाजिक यथार्थ की असरदार प्रस्तुति से सिनेमा के जरिए जनता में जागृति लाना भी संभव है। इसके ठीक विपरीत मूलधारा की फिल्मों ने जनता को कपोल-कल्पित...Read More

वीरप्पन

कलाकार – संदीप भारद्वाज, सचिन जोशी, लीजा रे, उषा जाधव, जरीन खान निर्देशक – राम गोपाल वर्मा अगर आपको राम गोपाल वर्मा की बॉक्स ऑफिस पर पिछली सुपरहिट फिल्म का नाम बताने के लिए कहा जाए तो यकीनन आपको थोड़ा वक्त जरूर लगेगा, पिछले कुछ समय से रामू बॉलिवुड में अपनी फिल्मों से ज्यादा अलग-अलग सोशल नेटवर्किंग साइट्स अपने अजीबोगरीब ट्वीट्स को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। रामू की इस फिल्म की बात करें तो बेशक यह फिल्म बस ठीक-ठाक है। लोकेशन और लीड किरदार के सिलेक्शन में रामू ने बाजी मारी तो फिल्म के दूसरे अहम किरदार एसटीएफ ऑफिसर कानन के रोल में सचिन जोशी का सिलेक्शन यकीनन रामू की मजबूरी लगती है। दरअसल, सचिन की वाइफ रैना जोशी इस फिल्म की को-प्रड्यूसर हैं, ऐसे में सचिन को फिल्म में एक अहम किरदार देना कहीं न कहीं रामू की मजबूरी रही होगी। बेशक, रामू ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी धमाकेदार एंट्री के लिए उसी ...Read More

वेटिंग

कलाकार – नसीरुद्दीन शाह, कल्कि कोचीन, रजत कपूर, अर्जुन माथुर, सुहासिनी मणिरत्नम निर्देशक – अनु मेनन फिल्मकारों द्वारा फिल्मों के विषयों को लेकर जिस तरह के नए प्रयोग हो रहे हैं, उनमें ‘वेटिंग’ सुखद अनुभव है, जहां निर्देशक अनु मेनन ने अस्पताल जैसे दुख और अवसाद वाले माहौल को बैकड्रॉप बनाया, मगर नसीरुद्दीन शाह और कल्कि कोचलिन जैसे समर्थ ऐक्टर्स की सहज जुगलबंदी से फिल्म को उदास नहीं रहने दिया। कहानी की शुरुआत होती है तारा (कल्कि कोचीन) से जो बदहवास कोच्चि के एक अस्पताल में प्रवेश करती है। वहां उसका पति रजत (अर्जुन माथुर ) गंभीर दुर्घटना के बाद कोमा जैसी स्थिति में दाखिल है। तारा और रजत की नई-नई शादी हुई है। अस्पताल में तारा की मुलाकात शिव (नसीरुद्दीन शाह) से होती है। शिव की पत्नी पिछले 6 महीनों से कोमा में है और डॉक्टर उसके ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके हैं, मगर शिव को पूर...Read More

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