Author: मंजुल भारद्वाज

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” मानवता की कलात्मक हुंकार

नब्बे का दशक देश,दुनिया और मानवता के लिए आमूल बदलाव का दौर है। “औद्योगिक क्रांति” के पहिये पर सवार होकर मानवता ने सामन्तवाद की दासता से निकलने का ख्वाब देखा। पर नब्बे के दशक तक आते आते साम्यवाद के किले ढह गए और “औद्योगिक क्रांति” सर्वहारा की मुक्ति का मसीहा होने की बजाय पूंजीवाद का खतरनाक, घोर शोषणवादी और अमानवीय उपक्रम निकला जिसने सामन्ती सोच को ना केवल मजबूती दी अपितु विज...Read More

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