Author: हनुमंत किशोर

एक थे परसाई

उनसे यूँ तो ‘फेस टू फेस’ कभी मिलना नही हुआ। बस किताबों और अखबारों के मार्फ़त ही उनसे मुलाकात थी। उन्हें हाईस्कूल के दिनों में पहली बार पढ़ा तो लगा बायोलोजी की प्रयोगशाला में मेढक की जगह किसी ने समाज को रख दिया है। चीर फाड़ कर आँत-अंतडिया सब बाहर बिखेर दी और बता दिया कि ये है अंदर की सच्चाई। कोई अलीबाबा था जो कहता था खुल जा सिम सिम और छुपे खजानों के दानवी दरवाजे खुल जाते थे सो हम भी जिन...Read More

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