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अभिनेता, अभिनेत्री और आज का रंगमंच

अभिनेता, अभिनेत्री और आज का रंगमंच

प्रचलित मान्यता यह है कि रंगमंच के केंद्र में अभिनेता- अभिनेत्री हैं। यह बात आज सुनने में भले ही बहुत सुकूनदायक लगे किन्तु इस कथन में जितनी सच्चाई है, उससे कहीं ज़्यादा मात्रा झूठ का है। रंगमंच के मंच के आगे (दर्शकदीर्घा) से यह बात पूर्ण सत्य का आभास देता है क्योंकि दर्शक दीर्घा से रंगमंच के मंच पर अभिनेताओं, अभिनेत्रियों का जीवंत अभिनय सबसे ज़्यादा प्रभावशाली और जादुई प्रतीत होता है। दर्शक इन्हीं के साथ भावों, संवादों और संवेदनाओं के मर्म को पकड़कर रंगमंच के जादुई यथार्थ में गोते लगाते हैं लेकिन मंच के परे, रंगमंच के पुरे चक्रव्यूह में प्रवेश कर यदि झांके तो स्थिति की दयनीयता और क्रूरता बिलबिला कर सामने आ जाती है; और हम देखते हैं कि जिस चीज़ को हम रंगमंच का केंद्र बिंदु मान रहे हैं दरअसल उसकी स्थिति प्रजातंत्र के उस जनता से कुछ ज़्यादा अच्छी नहीं है जो अपनी दयनीय स्थिति और अमानवीय दरिद्रता से मुक्ति हेतू तमाम प्रकार के लुभावने नारों के शोर में दिग्भ्रमित हो इस डर से एवीएम मशीन का बटन दबा आता है कि कहीं उसकी अंतरात्मा चुनाव नामक पवित्र और कर्तव्यनिष्ठ पर्व में सम्मिलित न होने के लिए उसे दुतत्कारने न लगे। यहाँ भी जनता को नायकत्व का टैग लगा है ठीक उसी प्रकार जैसे कि रंगमंच में अभिनेता-अभिनेत्री को केंद्र-बिंदु का। जबकि दोनों की स्थिति किसी कठपुतली जैसी ही है।

यह कब हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ – यह एक इतिहासिक अध्ययन का विषय है लेकिन यह सच है कि रंगमंच में अभिनेता पहले आया बाकि चीज़ें बाद मे। अब बाद मे आए प्राणी ने चुपके से कैसे और क्यों अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया, यह भी खोज का विषय है। लेकिन एक बात तो सच है कि सारा खेल सत्ता और धन का है। तभी तो सबकुछ झेल कर संघर्ष कर रहा अभिनेता निर्देशक बनते ही ठीक उसी सत्तावादी की तरह व्यवहार करने लगता है, जिससे कि कभी वह स्वयं त्रस्त रहा है। यह शायद पूंजीवाद का ही गोल पहिया है जो घूमता रहता है – गोल गोल। अर्थात हालत ठीक संसद वाली ही है जहाँ सत्ता पक्ष सत्तावादी और विरोध पक्ष विरोधवादी प्रवृति का शिकार होता है और सत्ता पक्ष का विरोध में या विरोध पक्ष का सत्ता में आ जाने से कोई ख़ास मुलभुत और नीतिगत बदलाव प्रत्यक्षतः देखने को नहीं मिलता।
रंगमंच एक सामूहिक कार्य है यदि यह सच है तो सामूहिकता का सिद्धांत यह कहता है कि समूह में कोई छोटा – बड़ा, कमज़ोर – मजबूत, ज़रूरी – गैरज़रूरी, फ़ालतू – महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि सब बराबर होते हैं। सबकी अपनी – अपनी भूमिका होती है और सामूहिकता का वजूद एक दूसरे के परस्पर सहयोग और विश्वास पर टिका होता है। लेकिन जब रंगमंच करते हुए एक व्यक्ति दूसरे पर मालिकाना हक जताने लगता है और दूसरे के मुकाबले में पहला आर्थिक और प्रसिद्धि के रूप में सम्पन्नता की ओर अग्रसर होने लगता है तो संदेह होना लाजमी है। वैसे ह्रास तो पुरे समाज में हुआ है फिर रंगमंच उससे अछूता कैसे रह सकता है? क्या श्रम के ऊपर पूंजी और सत्य के ऊपर फरेब, ईमादारी के ऊपर बेईमानी की सत्ता समाज में और प्रखरता से स्थापित नहीं हुई है? तो यही हाल रंगमंच का भी है, क्योंकि रंगकर्मी कोई आसमान से तो टपके नहीं हैं बल्कि वो भी इसी समाज के ही अंग हैं।

भारतीय रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना होने के पश्चात भी उसका मूल स्वरुप अभी भी शौक़िया ही है और सामाजिक स्तर पर उसकी स्वीकृति लगभग उपेक्षित वाली ही है। कुछ राज्यों में अपवाद स्वरुप स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन वहां भी आदर्श स्थिति तो नहीं ही है। हिंदी क्षेत्र की मध्यवर्गीय और सामंती मानसिकता आज भी इसे अधिकांशतः नाचनियां – बजनियां का ही पेश मानती है। फिर यह भी धारणा प्रखर रूप से विद्दमान है कि नाटक का कार्य उत्सवधर्मिता और मनोरंजन मात्र है। ऐसे माहौल में वर्तमान में ग्रुप थियेटर का लुप्त होना और लगभग एनजीओ के जैसा व्यक्ति-केंद्रित नाट्य दलों का अस्तिव में आ जाना एक कठिन समस्या है। वहीँ ग्रांट कल्चर भी ज़ोरो पर है। तो अब अमूमन नाटक कम प्रोडक्ट ज़्यादा तैयार हो रहे हैं। ग्रुप थियेटर जहाँ अपने तमाम खूबियों-खामियों के बावजूद एक अनुशासन सिखलाता था वही व्यक्ति केंद्रित रंगमंच जोड़-तोड़ के सहारे अपना काम निकलना और जैसे-तैसे एक नाटक को निपटा भर देना सिखला रहा है। ऐसे में जो थोड़ी बहुत प्रशिक्षण की प्रक्रिया चलती भी थी वह भी लगभग बंद हो गई है। नाटकों की संख्या में तो इज़ाफ़ा हुआ है लेकिन गुणवत्ता घोर रूप से प्रभावित हुई है। प्रोफेशनल्स के नाम पर ऐसी व्यूह रचना देखने को मिलती है जो अपने ही नाटकों में कही बातों को खुद नहीं मानता। ऐसे समय में सामाजिक और नैतिक ज़िम्मेदारी की बात, शराब के उस बोतल की तरह हो गई है जिसके अंदर बस महक बची है। अपने नए रंगकर्मियों का सही मार्गदर्शन करने का वक्त अब शायद ही किसी के पास है। सबको फोकटिया कलाकार चाहिए। हद तो यह है कि जनवादी संस्कृति के वाहक होने का दावा ठोकनेवाले कई दल भी इस बहती गंगा में किस्मत आजमाने में ज़रा सा भी संकोच नहीं कर रहे हैं।
गत कुछ वर्षों से विभिन्न प्रकार के अनुदानों के नाम पर कुछ पैसा रंगमंच के हिस्से भी आया है लेकिन इस पैसे के आगमन से बुरे और अ-कलात्मक परिणाम ही ज़्यादा देखने को मिला है। यहाँ समस्या पैसे के आगमन का नहीं बल्कि उसके उपयोग का है। ज़्यादा से ज़्यादा पैसा बचा लेने की बेचैनी ने जहाँ एक तरह झूठ और फरेब का खेल रचा है वहीँ रंगकर्मियों का आपसी वैमनस्य भी बढ़ा है। निर्देशक अब एक कलाकार कम दुकानदार ज़्यादा प्रतीत होने लगा है। बही खाते के खर्च के कॉलम में जिस मद में जितना रुपया भरा जाता है उतना गिने-चुने लोग ही खर्च करते हैं। जहाँ तक सवाल नाटक में कार्य कर रहे अभिनेताओं के मानदेय का है तो किसी भी एक नाटक में उनके मानदेय की सही राशि जानकार कोई भिखारी भी उनका उपहास उड़ा सकता है। लगभग यही दशा विभिन्न प्रकार के कुकुमुत्ते जैसे उग आए NGO जैसे सरकारी अनुदानधारी रंगमण्डलों के अभिनेता-अभिनेत्रियों की है। महोत्सव अनुदान की हालात तो यह है कि तीसरे दर्ज़ का इंतज़ाम के साथ वह नाटकवालों पर चंद हज़ार भी बड़े सोच-सोचकर खर्च करते हैं वही उस नाटक में यदि फ़िल्म में काम करनेवाला/वाली कोई कलाकार हो तो फिर लाखों रुपए हंस-हंसके उड़ा दे सकते हैं। हो सकता है कि एक नाटक करनेवाले दल के कुल खर्च के बराबर एक फ़िल्म कलाकार वाले नाट्यदल की शराब का बिल हो।

यदि सबकुछ ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब अभिनेताओं के नाम पर केवल “रद्दी माल” ही बचेगा रंगमंच के पास।अभी के समय का तो क्रूरतम सत्य है कि क्या अभिनेता-अभिनेत्री रंगमंच में अभिनय करते हुए अपना व अपने परिवार का जीवकोपार्जन कर सकता है? इस सवाल का जवाब है – नहीं, बिलकुल ही नहीं। कम से कम हिन्दी रंगमंच मे तो नहीं ही।

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